शनिवार, 30 नवंबर 2013

दिल की बातें - 2

क्यों तूने चुनी वो राह मुसाफ़िर,
जिसकी कोई मंज़िल ही नहीं।
हमराह किया एक क़ातिल को,
ऐतबार के जो क़ाबिल ही नहीं।

हर पल पूजा जिसको तुमने,
और चाहा था हरदम जिसको।
सोचा था जिसे शरीक़-ए-दिल,
उसको थी वफ़ा हासिल ही नहीं।

क्यों सोच लिया तूने अहमक,
सच्ची चाहत मिलती सबको।
क़िस्मत में तेरी बस नफ़रत है,
है प्यार कहीं शामिल ही नहीं। 

ये इश्क़ तो है दरिया ज़मज़म,
हर आशिक़ को कहते है सुना।
पर तेरे लिए वो समन्दर है,
है दूर तलक साहिल भी नहीं।

प्रणव कान्त झा 
१० अगस्त, २०१३

शनिवार, 27 जुलाई 2013

परोपकार

एक चिड़िया 
थी बंद एक पिंजड़े में,
गा रही थी 
कोई गीत अपनी मुक्ति का
आर्त स्वर में अपने।
सुना उस स्वरलहरी को
एक पथिक ने
था चला जा रहा जो पास ही में
पथ पर अपने।
था वह क्लांत, व्यथित
तन और मन दोनों ही से
परन्तु
सुनकर पंछी के उस स्वर को
जाना उसने, उसका प्रणयगीत
और
पाया एक नया उत्साह
असीम;
लक्ष्य से मिलन का अपने।
आनंद से तिरोहित हो वह
चल पड़ा उल्लसित मन से
गंतव्य की ओर अपने
विस्मृत कर अपनी व्यथा।
पराधीनता की असह्य पीड़ा में भी
सुख-संतोष की अनुभूति जागी
ह्रदय के किसी कोने में - उस चिड़िया के,
देख कर
उस पथिक की ख़ुशी
और
चमक उसके आँखों की।

-प्रणव कान्त झा
07 नवम्बर, 1996.

शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैथिली रचना - ३

हे हम्मर गामक पुरनी पोखरि
पोखरि भीड़क बुढ़बा पीपरि
अछि तोहरा नित शत बेरि नमन.

तोहरे छाहरि में खेला-धुपा
नवजुआन भेल कतेको बचपन,
तोहरे साक्षी कय कर्मक बल
बूढो सभ करथि स्वर्गगमन.

तोहरे झोंझरि में सांझ-भोर
चिड़ियों चुनमुनि करय गुंजन,
दियरि जरा गामक ललना सभ
भावी के करथि शुभकल्पन.

थाकल-मारल जं बाट-बटोही
पावथि तोहर सिहकैत पवन,
आल्हा-सलहेसक तान धरथि
बिसरि अप्पन दिन भरिक थकन.

गामक एका केर कल्पतरु
तों छलाह सिनेहक क्रीडांगन,
गामक मान-पहरुआ तों
फेर भेल कोना ई अधोगमन?

आई गाम बनल अछि कुरुक्षेत्र
दुर्योधन अछि केओ दु:शासन,
आ धर्मराज अछि बौक बनल
कय रहल हारि परदेस गमन.

मानवता कें पहचान बिसरि
किछु सोल्हकन आ किछु बाभन,
अछि खंड-खंड पाखण्ड भरल
मनुक्खक लेल नहि कतहु शरण.

सोदरो में नित रगड़ा-झगड़ा
चंहुदिशि भ रहल बिक्खबमन,
मुँह मोड़ने बैसल नीलकंठ
भयभीत करय सं गरलशमन.

हे पीपरिक गहबर कें ब्रह्मपिंड
तोहरा छह हमरो आत्मार्पण,
बस एक बेरि तों फिरा दहक
तोहर छाहरि, हम्मर नेनपनि,
सम्मतिक बहय फेरि वैह पवन
फेरि करह नेह केर प्रत्यर्पण.

हे हम्मर गामक पुरनी पोखरि,
पोखरिक भीड़क बुढ़बा पीपरि,
दुहु कें कोटिशःअभिनन्दन.

प्रणव कान्त. 01 नवम्बर, 2005.

मैथिली रचना - २

हे ईश्वर!
सुनलंहु - बूढ़-पुरान सं
सदिखन,
पढ़लंहु – पोथियो में 
ठाम-ठाम
जे
व्यापित छह तों अपने
अपन सभ रचना में,
प्रकृतिक कण-कण में
समायल छह तों.
फेर तS,
जखन-जखन कियो हंसैछ-
तोंही हँसैत छह,
जखन-जखन कियो कनैछ-
तोंही कनैत छह,
जखन कियो नीक करैछ-
तोंही करैत छह,
जखन कियो अधलाह करैछ-
तोंही तS करैत छह.
फेर तS,
जं ‘राम’ में तों छलाह-
तं ‘रावणों’ में,
जं ‘मोहम्मद’ में तों छलाह-
तं ‘जहलो’ में,
जं ‘ईसा’ में तों छलाह-
तं ‘फ़िरऔनो’ में.
हे ईश्वर!
यदि तों सृष्टि नियंता छह
तS
एना कियैक होइछ?
कियैक तों सदिखन
‘राम’, ‘मोहम्मद’, आ ‘ईसे’ नहिं होइत छह?

प्रणव कान्त. ०२ जनवरी, २०१३.

अनूदित मैथिली रचना - २

एकटा धिया,
बतियाइत रहय 
एक गोट बेख सं-
तोहर आ हम्मर 
बिधना एक्कहि रंग;
हमरा
गर्भक भीतरे
मारल जाइछ, आ
तोहरा
गर्भक बाहिर.

ओ गाछ,
बेटीक पीर कें
आत्मसात करैत बाजल-
हे हय बहिना!
हम दुहु गोटे मिलियो कें,
की बुझा सकब
अहि मनुक्ख जाति कें, कि
अपने पयर पर
कुरहरि मारब
बुझनुकक काज नहिं?

धिया/धरती केर
उर्वरा थिक
आओर
बेख......नूतनता.
की हमरा-तोहरा बिन
अहि जगत केर
सपनो संभव?

हे माँ शारदे!
तोहरो चरण में
शत-शत प्रणाम.

आब तोंही,
हमरा सभ कें
बुद्धि दे, ज्ञान दे;
जाहि सं
प्रकृति केर
अहि दुहू
अनमोल रचना केर-
महातम बुझि सकी;
अहि दुहू सं-
नेह कय सकी.

हिंदी सं अनुवाद: प्रणव कान्त. १५ फरवरी, २०१३
साभार: नेहा कर्ण.

अनूदित मैथिली रचना - १

कतहु 
पेटक आगि नहीं मिझाय,
तs
कतहु
'तलब'केर अंगार जागल अछि.
कतहु
चुबैत नोर भीजल आँखि सं,
तs
कतहु
'आसव'केर धार लागल अछि.
हमरा लगैत अछि,
आई कतेको गरीबक नेना कें
भुखले सूतय पड़त.
कियैक तs
'मिल'क आगाँ, दारूक भठ्ठी पर
नमहर 'कतार' लागल अछि.
अखबार में पढ़ल खबरि कें मोन पारैत,
की जाने, केहन-केहन सपना आओत?
छत पर टाँगल पंखा कें निहारैत,
लगैत अछि भोरे भs जायत.
हमरा लगैत अछि,
आई एकटा माय, राति भरि करौटे फेरतीह,
बेटी फोन कयने छलन्हि,
'आई राति आबय काल अबेर भs जायत.'
आई-काल्हि,
किछु सहमैत-डेरायल लोक सभ
छत पर दियरि सजबैत छथि,
किछु भीड़ सं बचैत-बचाबैत
बज़ार दिशि जाईत छथि.
हमरा लगैत अछि,
काल्हि शहर में 'कर्फ्यू' लागत अबस्स,
अहि बेर ईद आ दिवाली
संगहि जे अबैत अछि.

हिंदी सं अनुवाद: प्रणव कान्त झा. २७ फ़रवरी, २०१३.


मैथिली रचना - १

उठू बटोही, ओहि बाट चलू,
जे बाट कियो देखल धरि नहिं,
अप्पन हियरा में ओ स्वप्न गढ़ू,
जे स्वप्न कियो सोचल धरि नहिं.

प्रकृति केर सुन्दरतम कृति छी आहां,
ई सुन्दरताक कोन अर्थ कहू?
अछि बिक्ख भरल आकंठ जतय,
ओ सोनक घट लय की करब कहू?

स्वार्थक लेल अहि धरती पर,
के नहिं कौखन यौ जीबैत अछि?
चिरंजीवी रहैत अछि वैह पुरुख,
नित आनक घाओ जे सीबैत अछि?

अछि बाट कठिन परिवर्तन केर,
ई आन्दोलन अछि सरल कतय?
सेज सजल अछि कांटक ई,
सुविधा सं भरल ई महल कतय?
जं लक्ष्य सबल अछि अंतस में,
पथ केर पाथर अछि अटल कतय?

हे वीर उठू, हुंकार करू,
हर विघ्न माथा कें झुका देत,
जं झुकय नहिं, प्रतिकार करू,
पाँछा पग अप्पन हटा लेत.

धीरज, दृढ़ता रखलहुं मोन में,
आहां विजयक अमृत पीयब यौ,
छी विजयीक वंशज आहां,
विजयी भैये कs जीयब यौ.

@ प्रणव कान्त झा.
०२ मार्च, २०१३.

'यात्री' की याद में

हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

थे जीवनपथ के यात्री तुम 
ना रहे कभी निःशब्द कहीं
वाणी तुम्हारी चुप न रही
लेखनी तुम्हारी रुक न सकी
फ़िर शब्दों को मौन छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

रहे जीवन भर यायावर तुम
और मृत्यु का आमंत्रण सुन
उससे भी दो-दो हाथ लड़े
जैसे जीवन भर अन्यायों से
अपने शब्दों के साथ लड़े
फ़िर हाथों का लेखन अस्त्र तोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

निर्मोह चले थे तुम हर पल
हर निर्बल को नव आस दिया
तुम ख़ुद कष्टों के बीच चले
सबके अधरों को हास दिया
फ़िर कोटि नयन में अश्रु छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

अपनी मिट्टी को अंतिम प्रणाम कर
तुम रूठ चले थे एकबार
पर माँ की ममता से बंधकर
तुम लौट आये फ़िर बार-बार
फ़िर माँ के आँचल से मुंह मोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आखिर चले गए?

तुम बसे हुए हो जन-जन में
कोई भी तुम्हें क्या भूलेगा?
उन्मुक्त हास की यादों में
सदियों जन-मानस झूलेगा
फ़िर-फ़िर आने की आशा दे
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

प्रणव कान्त झा
21 मार्च, 1999.

मेरा दृष्टिकोण - २

हर वर्ष हमारे देश के हिन्दू मतावलंबी देवोत्थान एकादशी का व्रत रखते हैं, विशेषतः मैथिल ब्राह्मण। जब एक संस्कृति सदियों से अपने अंदर हजारों कुप्रथाओं को जन्म देकर उन्हें महिमामंडित करती हो और उन कुप्रथाओं के अमानवीय कुप्रभावों की तरफ से सहजता से आँख मूँदे पड़ी हो, जब मनुष्य के अंदर बैठा देव अनंत शैय्या से उठने को तैयार नहीं हो रहा हो, उसे अपने मिथ्यास्वप्नों और स्वार्थनिद्रा में आनंद अनुभूति मिल रही हो तो प्रतीकात्मक देवोत्थान सदियों तक करते रहने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। सिर्फ संस्कृतियों के नाम पर ऐसी निरर्थक रिवाजों को ढोते रहने से अच्छा है इन्हें समाप्त कर कुछ सार्थक संस्कृतियाँ और प्रथाएँ बनाई जाएँ। क्षमा चाहुंगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हों तो। वैसे आज कल अपने देश में भावनाएं आहत होने की प्रथा बड़े ज़ोरों पर है।वैसे ऐसे धार्मिक (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले हों) लोगों की भावनाएं भी कमाल की होती हैं - जब दूसरों की आहत हों तो आनंद पर अपनी आहत हों तो पीड़ा।

बस इतनी सी ख़्वाहिश है

देखते - देखते 
साल बीत गया यह भी। 
मुड़ कर देखूँ तो 
पता ही नहीं चला 
कब बीत गए
जीवन के 33 साल?
इन सालों में;
हरेक साल ही
लिए संकल्प-
कुछ पूरे, कुछ अधूरे।
हरेक साल के
साथ जुड़ी हैं यादें-
कुछ कड़वी, कुछ मीठी।
हरेक साल में
बने हैं रिश्ते, जिनसे
कुछ दर्द मिले कुछ खुशियाँ।
हरेक साल के
थे अपने कुछ लक्ष्य-
और
अपने तईं जी-जान लगाया
पूरा करने को उन्हें।
अब, जब आज
रुका हूँ लेने को सांसें
तो
देखता हूँ की
बीत गए 33 साल।
लगता है
अभी तो कुछ किया ही कहाँ?
देखने को हैं - सपने बाँकी बहुत
सुनने को है- आवाज़ वक़्त की
छूने को हैं- लक्ष्य अनछुए बहुत
करने को हैं- बदलाव कई
पाने को है- सारा जहां बांक़ी
लेने को हैं- संकल्प और कई
और सबसे ऊपर
लौटाने को हैं- कर्ज़ उन सबके
दिया है जिन्होंने
परवरिश, सपने, आशाएँ, विश्वास और मुस्कान
मेरे जीवन को।
बस इतनी सी ख़्वाहिश है
आने वाले साल में
मेरी।

-प्रणव कान्त झा।
31, दिसंबर, 2012।
जालंधर।

माँ का ऋणी

माँ,
आज भी तुम्हें है-
मेरी हर जरूरत का ख़याल 
अपनी 
हर जरुरत से ज़्यादा।
माँ,
आज भी पहले की तरह-
सहती हो मेरे हिस्से का
हर दर्द बेदर्द बन कर;
मुझे दर्द से बचाने के लिए।
माँ,
आज भी मेरी रक्षार्थ-
झोंक देती हो ख़ुद को
काल की भट्ठी में,
स्वयं को अरक्षित कर भी।
माँ,
लोग कहते हैं-
उऋण हो जाऊँगा मैं
तुम्हें मुखाग्नि देकर,
तुम्हारे हर क़र्ज़ से।
क्या
सच में तुम
ऋण मुक्त कर दोगी मुझे
इस तरह?
माँ,
मैं तुम्हारा ऋणी
रहना चाहता हूँ;
अगले सात जन्मों तक;
तुम्हारा ही बच्चा
होना चाहता हूँ ......माँ।

प्रणव कान्त झा
12 मई, 2013.

मेरा दृष्टिकोण- १

मौजूदा शक्ल में दुनियां का हर धर्म नकारा और बेकार है। धर्म अफीम से भी भयानक नशा है. यह इंसान के विवेक को और अच्छे-बुरे के तर्क की क्षमता को नष्ट कर देता है. यह इंसानियत को कुछ पुराने पड़ चुके प्रतीकों और क़िताबों का बंधक बना कर छोड़ देता है. धार्मिकों का कहना है (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों ना हों?) कि ईश्वर का अस्तित्व जीवों और धर्म की रक्षा के लिए है, फिर तो सचमुच ये कौन लोग हैं जिनकी मदद के बगैर ईश्वर और धर्म का अस्तित्व स्वयं ख़तरे में आ जाता है? कभी इस्लाम ख़तरे में आ जाता है, कभी हिंदुत्व, कभी ईसाइयत तो कभी सिक्खी? और अगर सचमुच ईश्वर और धर्म अपनी रक्षा के लिए इन ठेकेदारों पर निर्भर है तो वो हमारी रक्षा किस तरह कर पायेगा? ईश्वर और धर्म के परिकल्पना की जरुरत जंगलों में जानवरों की तरह रहने वाली बर्बर मनुष्य जाति को सभ्यता और इंसानियत से भरे समाज में बदलने के लिए पड़ी होगी.अगर उसी ईश्वर और धर्म की रक्षा का तर्क देकर इंसान सभ्यता और इंसानियत को छोड़ फिर से बर्बरता और हैवानियत के रास्ते पर चल पड़े और उसे सही ठहराने के तर्क गढ़ने लगे तो सचमुच ईश्वर और धर्म के अस्तित्व पर सवाल उठने ही चाहिये. थोड़ी देर को मान भी लें कि तथाकथित ईश्वर पूरे संसार का माँ-बाप है और हम सब जीव उसके बच्चे, तो फ़िर हर बच्चे का माँ-बाप से प्यार जताने का अपना-अपना तरीका होता है। फ़िर किसी एक बच्चे को ये हक़ कैसे होता कि वो दूसरों के तरीक़े को ग़लत और ख़ुद के तरीक़े को सबसे सही बताये? क्या ऐसा सोच कर (सही-ग़लत का फ़ैसला अपने हाथों लेकर) वह दूसरों के हक़ और माँ-बाप के अस्तित्व का अपमान नहीं कर रहा होता? क्या हर धर्म के मानने वाले आज इसी ख़ुद-पसंदी में नहीं जी रहे? अगर ऐसी सोच के साथ प्रतिक्रिया कर उन्हें लगता है कि वो ईश्वर और धर्म की रक्षा कर रहे हैं,तो ऐसे पंगु और लाचार ईश्वर और धर्म मानवता के किसी काम के नहीं। इनका अस्तित्व ख़त्म हो जाना ही बेहतर है।

बाबू जी

बाबू जी,
आभारी हूँ मैं 
सदैव आपका 
कि 
धृतराष्ट्र की तरह
पुत्रमोह में पड़-
दुर्योधन नहीं बनाया मुझे।
आपके
शब्दों की प्रेरणा
कि
'न्यायोचित और मानवोचित मार्ग ही चलना सदैव'
डिगने नहीं देते
कदम मेरे
मुश्किल घड़ियों में भी
जब
बहुत आसान होता है
पथ से विचलित होना
अक्सरहां।
बाबू जी,
मैं कृतज्ञ हूँ
आपका हमेशा
कि
मेरे बचपन से ही
अपने
कठोर अनुशासन के आवरण में
छुपा कर
अपने पितृस्नेह को-
आपने गढ़ा मुझे।
आप ही का
सृजन-
आज
जो भी हूँ;
एक नर्म दिल, न्यायोचित, संवेदनशील, कर्मशील
और
सबसे महत्वपूर्ण
कि
एक मनुष्य बनने को प्रयासरत-
मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जून, 2013.

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

आज का मानव

मानव -
कल के मानव ने 
बनना चाहा प्रगतिशील,
परिकल्पना की विकास की, 
श्रम किया 
और 
श्रृंखला बना दी;
आविष्कारों की।
उसने 
सारे कार्यों को 
करवा लिया मशीनों से 
और अंततः 
बना वह आज का-
विकसित मानव।
इस 
प्रगति के होड़ में 
खो दिया उसने-
मानवता को, आदर्शों को, जीवनमूल्यों को 
और 
खोया उसने अपनी संस्कृति/संस्कारों को भी।
यहाँ तक कि 
तिलांजलि दे रहा वह;
पवित्र मानवीय भावनाओं की भी 
इस विकास की 
हुताग्नि में।
आज का मानव-
यंत्रों को रचते-रचते 
स्वयं भी बन गया,
एक यंत्र-मानव।
हाँ,
सचमुच यंत्र ही तो
बन गया वह,
क्योंकि 
यंत्र ही तो होते हैं-
भावनाओं से शून्य।
अक्सरहां
सोचता हूँ मैं,
कि आख़िर 
किन संस्कारों का धरोहर देगा यह 
अपने कल-
अपने भविष्य को?
पर,
कुछ तो देगा ही-
प्रेम नहीं; घृणा सही,
सत्य नहीं; मिथ्या सही,
दया नहीं; निर्ममता सही,
सहयोग नहीं; ईर्ष्या सही,
निश्छलता नहीं; धूर्तता सही,
मानवता नहीं; पशुता सही,  
रचनात्मकता नहीं; विध्वंसात्मकता सही,
कुछ तो देगा ही।
प्रगति की 
मृगमरीचिका में खोया-
आज का मानव,
क्या इन्हीं विषमताओं की नींव पर 
खड़ा करेगा 
अपना स्वप्न-महल?
यदि हाँ,
तो 
तनिक सोचे वह स्वयं ही,
कि 
परिणाम क्या होगा इसका?
सृष्टि क्या होगी उसकी?
कैसा कल, कैसे भविष्य को सिरजेगा वह?

प्रणव कान्त झा 
15 अगस्त, 1996.

शनिवार, 6 जुलाई 2013

सुख-दुःख

पतझड़ के बाद है आता जब बसंत,
फूल हैं मिलते, हरसूं गंध फैलाते हुए.
पहले झुलसती धरा आग सी धूप में,
तब मेघ आते, जलधार बरसाते हुए.

पाषाण सहते हैं प्रथमतः चोट को,
सृजित होतीं आकृतियाँ तब मुस्काती हुई.
दर्द सहती हैं खिचन की तारें जब,
फ़िर निकलती तान मदमाती हुई.

जब है तपता कनक आग की आँच पर,
तब वो बनता, कुंदन ग़ज़ब ढाता हुआ,
जननी है सहती प्रसव की पीड़ जब,
फ़िर जनम लेता, बचपन मुस्काता हुआ.

यूँ देखते हम प्रकृति के हर खेल में,
दुख के पीछे, सुख है आता, मन हर्षाता हुआ.

- प्रणव कान्त झा
20 अप्रैल, 2000 (संपादित-06 जुलाई, 2013). 

सोमवार, 27 मई 2013

जीवन-एक दृष्टिकोण-1

सुख का अनुगामी होता दुःख,
दुःख के बाद आता है सुख।
फ़िर क्यों हारे मानव, शाश्वत
कोमल ह्रदय विपत्ति के सन्मुख?

मन भी है शिशु के समान,
ढूंढता आलंब शैशवपन में।
आशा-विश्वास सँभालते उसको,
देते हैं सहारा यौवन में।

जीवन आशाओं की है दीपावली,
कुछ दीप जले जीवन न मिटे।
खोजो, बंद चक्षुपट खोलो,
मिल जाएगा नवदीप सखे।

सोने में कहाँ प्रतीक्षा है,
सोये को कभी-कुछ मिला कहीं?
अपनी पलकें बस खुली रखो,
है सच्ची लगन निष्फल न कभी,
शायद मिल जाए कोई अपना,
इस जीवनपथ में तुम्हें कहीं।

प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2002.


गुरुवार, 16 मई 2013

ज़िन्दा यादें

तुम,
तुम्हारा रूप सलोना,
खनकती हँसी तुम्हारी,
तुम्हारी मीठी बातें;
जो थीं, वादों की बारात-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
दूर जाने की बात पर
वो ग़ुस्सा तेरा,
चले जाने पर
इन्तिज़ार की बेक़रारी
और
देर से लौटने पर
वो रूठना तेरा,
फिर
हाथ जोड़ने से पहले
मान जाना तेरा-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
तुम्हारा
वो रेशमी छुअन,
गुलाबी होठों की गर्मी,
साँसों की गमक तुम्हारी;
मेरे शानों से लगकर
लिपटना तेरा
और फिर
वो बेक़रार तफ़्तीश
कि
"भूल जाओगे मुझे?"-
ज़िंदा  हैं हरपल
यादों में मेरी।
हर पल
ज़िन्दा  हैं
यादों में मेरी-
तेरी
वो कजरारी आँखें
कि
जिनमें
नशा है- एक अनोखे शराब सा।
इन
आँखों के
एकटक देखने का एहसास,
हरपल
बेचैन किये है मुझे।
लगता है
ऐसा
कि अब भी
पीछा करती हैं हरपल
वो आँखें तुम्हारी।
सोना .....जान .....लौट आओ;
गर
सुन रही हो मेरी सदा
कि
जुदा होकर भी,
हरपल
तेरे होने का एहसास
और
ये यादें तेरे कुरबत की
पागल कर देंगी मुझे।

प्रणव कान्त झा
22 जुलाई, 2004.

प्रतीक्षा

खुली रहती है,
आज भी
वो खिड़की,
जहाँ से बातें किया करते थे
हम दोनों।
खड़ा है,
आज भी
वह आम का पेड़,
टिक कर खड़ी होती थी
तुम जिससे
और
तका करती थी
राह मेरी।
सूना पड़ा है,
वह दरवाज़ा
आज भी
जहाँ से निहारा करती थी
तुम मुझे
जब तक
ओझल न हो जाता था मैं।
खुला रहता है,
आज भी
किवाड़ मेरे कमरे का
जहाँ से आकर
गुदगुदाती थी
तुम मुझे अल-सुब्ह
और
धरा करती थी थपकियाँ
गालों पर मेरे
जगाने को मुझे।
प्रतीक्षा है सबको
सिर्फ़  तुम्हारी,
आज भी
ऐसा लगता है-
निकल पड़ोगी झपाक से तुम
किसी कोने से
और
ख़त्म हो जाएगी
इनकी
चिरप्रतीक्षा।

प्रणव कान्त झा
19 जुलाई, 2004.

इन्तिज़ार

इन्तिज़ार किया है,
नौ महीने मैंने
माँ  की कोख़  में पड़े-
ज़िन्दगी के लिए।
इन्तिज़ार में ही
जिए जा रहा हूँ,
साल-दर-साल
हरेक मुश्किल-ओ-मुसीबत से लड़ता
मौत के लिए-
जिसका कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं।
मगर,
ख़ुदा का वादा है
इंसान से-
ज़िन्दगी और मौत के लिए।
मैं कर लूँगा
इन्तिज़ार तुम्हारा भी-
ताक़यामत
कि
तुम भी कोई
वादा तो करो- ख़ुदा  की तरह।
ऐ ......सुनो,
सफ़र इन्तिज़ार का
मुश्किल है बहुत
कि
ये वादे ही तो
देते हैं ताक़त-
किसी के इन्तिज़ार के लिए।
ऐ .......सुनो,
कोई यकीन तो दो
अपने
वादे के पास रखने का
कि
ये यकीन ही तो
होता है सहारा-
किसी के इन्तिज़ार में।

प्रणव कान्त झा
08 जुलाई, 2004.

चाहता हूँ मैं

मैं
अभिलाषित हूँ-
छूने को सीमाहीन, क्षितिजहीन
नीलगगन को
एक लम्बी उड़ान के बाद।
पर,
हूँ विवश मैं,
कतर दिए गए हैं पंख मेरे-
अपने कर्तव्यनिर्वाह के लिए।
मैं
उत्कंठित हूँ-
नापने को नीलहरित, तटहीन
वारिधि की
अथाह, निस्सीम गहराई को।
पर,
हूँ अवश मैं,
कर दिया गया हूँ हस्तपाद विच्छिन्न-
लोकलज्जा के भय से।
मैं
स्वप्निल हूँ-
क्षितिज मिलन को,
पाने को आत्मा की स्वतंत्रता;
विवशता की बेड़ियों में जकड़ा।
और तोड़कर
बंधनों को सारे
एक दिशाहीन, अंतहीन
यात्रा पर निकलना
चाहता हूँ मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 1998. 

बुधवार, 8 मई 2013

एक क़दम

काश
एक क़दम
बस, एक क़दम
और चलता तो
सारा आकाश मेरी मुठ्ठी में बंद होता,
समंदर की लहरें मेरे पैर चूमतीं,
हवाएं मेरी साँसों में क़ैद होतीं,
मुहब्बतें मेरे सीने में बंद होतीं,
ज़माने का निज़ाम मेरे हाथों में होता
और
ज़िन्दगी नाचती मेरे इशारों पर
अगर
चल लेता मैं
बस, एक क़दम और।
एक क़दम;
बस
इसी एक क़दम के फ़ासले ने
उलट दी ज़िन्दगी मेरी।
बस
एक क़दम के फ़ासले ने
ख़ाली कर दिए मेरे हाथ,
खींच ली ज़मीन पैरों के नीचे से
और
कर दिया मज़बूर मुझे-
ज़िन्दगी के हाथों थमी डोर से बंधे
लट्टू की तरह नाचने को।
बस
एक क़दम का फ़ासला-
कितना छोटा फ़ासला?
पर
कितना मुश्किल है तय करना;
कि बस इसी
एक क़दम का फ़ासला होता है-
कामयाबी और नाकामयाबी के बीच,
रोशनी और तारीकी के बीच,
ज़मीन और खाई के बीच,
महफ़िल और तन्हाई के बीच,
शोहरत और रुसवाई के बीच,
ज़िन्दगी और मौत के बीच
और
बस एक ही क़दम का
तो फ़ासला होता है-
बन्दे और ख़ुदा के बीच।

प्रणव कान्त झा
22 जून, 2003.
    

वक़्त और ज़िन्दगी

बहुत बेरहम है-
वक़्त,
और दो क़दम ज़्यादा उससे-
ये ज़िन्दगी।
जब तक चलते हैं,
इसके बनाए लीक पर 
और नाचते इसके हाथों;
बहुत ख़ुशगवार 
और पुरसुकूं होते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
जिसके उठे कदम मुख्तलिफ़ 
कि जो राह अपनी 
ख़ुद बनाने चला अलग 
कर देते हैं जीना अज़ाब-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
गर हालात चलें हमवार 
और साथ चले 
क़िस्मत  का साया जिसके,
सामने घुटने टेक देते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
मैं भी चलता हूँ 
अक्सर मुख़ालिफ़ इनके,
वाहिद ही ये ग़लती कि 
हालात और क़िस्मत हमकदम नहीं होते;
फिर तो दोनों ने हराया है मुझे बारहां-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
एक ही ग़लती  की सज़ा का सलीब 
ढोते हुए कांधों पर बरसों 
चलता जा रहा हूँ तन्हा
और उड़ाते हैं मेरा मज़ाक़-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
कभी-कभी सोचता हूँ 
कि इस ज़िन्दगी से 
तो न जीना बेहतर 
मगर, 
ये ना होती तो 
मैं ऐसा सोचता कैसे?
कि मेरी हर सोच लिखने को 
मुहैया है मुझे-
वक़्त बजरीये ज़िन्दगी।  

प्रणव कान्त झा 
04 सितम्बर, 2001. 

मंगलवार, 7 मई 2013

एहसास 2

क्यों
बयां करने को कोई दास्तां
लफ़्ज़  ज़रूरी होते हैं?
क्यों
कहने को किसी से दिल की बात
लफ़्ज़ ज़रूरी होते हैं?
कि
लफ़्ज़  होते हैं दिमाग़  की उपज
ये झूठे भी तो हो सकते हैं,
कोई कातिल भी हो सकता है
शीरींज़बान।
कोई क्यों नहीं समझता
किसी की आँखों की भाषा?
कोई क्यों नहीं पढता
किसी की आँखों में लिखी इबारत?
कोई क्यों नहीं देखता
किसी की आँखों में बसी अपनी ही तस्वीर?
कि
आँखें बोलती हैं दिल की ज़बान,
कि
आँखें ही सिर्फ़ सच बोलती हैं।
सुनने को लफ़्ज़ों की ज़बान,
ज़रूरी हैं दो कान-
ये धोखा भी दे देते हैं।
पर
समझने को आँखों की बातें-
ज़रूरी है; एक ख़ूबसूरत दिल,
कि
दिलों के एहसास-
कभी धोखा नहीं देते,
कि
कभी झूठे नहीं होते-
दिलों के एहसास।

प्रणव कान्त झा
04 जुलाई, 2004.
  

एहसास 1

ख़ुशबू को किसी ने नहीं देखा,
हवा को भी किसी ने नहीं देखा।
ममता को किसी ने नहीं देखा,
दुआ को भी किसी ने नहीं देखा।
इश्क़ को किसी ने नहीं देखा,
ख़ुदा को किसी ने देखा है क्या?
नहीं,
ये तो बस यक़ीन हैं;
पाने को इन्हें
ज़रुरत है एहसास की।
हाँ,
बस
एहसास ही काफ़ी है
इनके होने का।

प्रणव कान्त झा
28 जून, 2004.

हे ईश्वर ....क्यों?

हे ईश्वर,
सुना है- बड़े-बूढों से
हमेशा
पढ़ा है- किताबों में
हर जगह
कि
स्थित हो तुम स्वयं-
अपनी हर रचना में,
प्रकृति के कण-कण में
समाहित हो तुम।
फिर तो,
हर बार जब कोई हँसता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई रोता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई अच्छाई करता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई बुराई करता है-
तुम होते हो।
फिर तो,
अगर राम में तुम थे;
तो रावण में भी,
अगर मुहम्मद में तुम थे;
तो जहल में भी,
अगर ईसा में तुम ही थे;
तो फिरऔन में भी।
हे ईश्वर!
तुम ही अगर सृष्टि-नियंता हो
तो
ऐसा क्यों होता है?
क्यों तुम हमेशा
राम, मुहम्मद और ईसा ही नहीं होते?

प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2006.

दिल की बातें - 1

जख्म हर बार नए कुछ मिले गहरे
चल पड़ा जब भी मैं दवा  ढूँढने,
सांस घुटने सी लगी जब बैठे-बैठे
बाद मुद्दत के निकला मैं हवा ढूँढने।

हादसे ऐसे भी हैं ज़िन्दगी में मेरी
बज़ाहिर जो बेवजह तो हैं भी नहीं,
जाता हूँ उलझ अपने ही सवालों में
जब भी निकला हूँ  कोई वजह ढूँढने।

कुछ जुर्म किये तुमने सरेराह मेरी
जानती हो तुम उनकी तलाफ़ी है नहीं,
ख़ुद को भी पाता हूँ गुनाहगार कहीं
निकला तेरे वास्ते जब सज़ा ढूँढने।

इश्क़  में हासिल है सनम की वफ़ा
हर तरफ़ बस यही देखा है सुना,
मुझको तो मिले हैं सभी माहिरे जफ़ा
निकलूँ जब भी बावफ़ा ढूँढने।

अपनी ख़ुदी  भी साथ देती नहीं
जा रहा मैं जमाने की रजा  पाने,
हर नज़र ख़ाली, लब ख़ामोश यहाँ
किसे कहूँ कि चल प्यार की सदा ढूँढने।

प्रणव कान्त झा
२५ जून, २०१२



सोमवार, 6 मई 2013

आशा

बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा-
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर।
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएं,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें-
या फिर घड़ी की टिक-टिक चारों ओर।
सब कुछ पूर्ववत-
स्थिर, स्तब्ध-
सिवाय एक समय के चलने की आवाज़ के।
यह भंग करती है सन्नाटे को -
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक।
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों  की झीरियों से -
झाँक रहीं हैं कुछ किरणें।
यह घड़ी  की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा-
कि
बंद दरवाज़ों
और
गहरी नीरवता के पार-
निखरी है दुनियाँ।
इन किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक;
तोड़ ही देंगी
सन्नाटों और अंधेरों से भरी-
इस दुनियाँ के
बंद दरवाज़ों को;
कभी-ना-कभी।

प्रणव कान्त झा
२१ अप्रैल, २०१३।








शुक्रवार, 8 मार्च 2013

प्रकृति और पुरुष.

प्रकृति और पुरुष-
बैठे 
एकदिन
आमने-सामने.
पुरुष ने
शुरू कर दिया-
हिसाब-क़िताब
प्रकृति से.
जैसा कि
अक्सर ही
किया करता है वह;
आख़िरकार
वणिक जो ठहरा
सदा से.
पुरुष ने पूछा-
तुम्हें अंदाज़ा भी है
मेरी ताक़त का क्या?
मैंने तुम्हें
कहाँ से कहाँ
पहुँचाया
और
तुम तो बग़ैर मेरे
सोच भी
सकती क्या स्वयं को?
पुरुष ने
ख़ूब जताया,
बातों-बातों में
बताई-
प्रकृति को
उसकी औक़ात.
सारा दंभ,
सारा अहं,
सारे राग-उपराग
और
सारी धृष्टता
पुरुष की
सह ली पुनः
प्रकृति ने पूर्ववत्.
बिहुँसी
प्रकृति,
पूछा
बड़ी ही शीलता से-
हे पुरुष!
कभी सोचना ज़रा-
अगर
मैं चाहती ही नहीं
कि
सृजन हो तुम्हारा,
अगर
मैं चाहती ही नहीं
कि
पालन हो तुम्हारा
तो
मेरी ही छाती पर बैठ
क्या ये
आलंभ-उपालंभ,
राग-उपराग
और
आदेश-उपदेश
दे रहे होते तुम मुझे?
अगर
मैंने दिखाई ही नहीं होती
तुम्हें,
ये निस्सीम सृष्टि
तो
मुझे ही मेरी सीमा
क्या दिखा रहे होते तुम?
तो फिर,
कभी तो
शर्मिंदा भी हो जाओ
कृतघ्नता पर अपनी
ताकि
मुझे भी अपनी
दया, ममता, वात्सल्य, स्नेह, धैर्य
और
सृजन की क्षमता पर
शर्म और पछतावा
तो नहीं हो कभी!

@ प्रणव कान्त झा, ०८ मार्च, २०१३.

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

आउट ऑफ़ डेट

बदल रहा है सबकुछ
इस नए संसार में,
विकास की सीढियां तय करते
हम पहुँच चुके हैं - इक्कीसवीं सदी के द्वार पर.
परिवर्तन की क्रांति ने
बदल दीं हैं - सारी मान्यताएं,
सभी धारणाओं को.
इस क्रांति ने;
बदल दीं हैं-
हमारी जीवन शैली एकदम से,
अपनाई है हमने एक नई शैली-
आधुनिकता, मॉडर्नाइजेशन.
नयेपन की चमक से
चौंधियाई आँखें हमारी,
दिखा रहीं हैं राह-
अपने नौनिहालों को यही.
और दे रहे हैं धरोहर
हम उन्हें-
हाय-हेलो की संस्कृति का
क्योंकि बनाना चाहते हैं
हम उन्हें-
मॉडर्न; बिलकुल अपनी तरह.
अपने गौरवमय इतिहास,
परिष्कृत संस्कृतियों,
प्रातःस्मर्णीय महापुरुषों,
सुरुचिपूर्ण कलाओं,
श्रेष्ठ साहित्यों
एवं
उच्च आदर्शों को
भूल चुके हम,
'आउट ऑफ़ डेट' कह कर.
क्या कभी सोचा हमने,
क्या करेंगे हम जब
कल को हमारे ही बच्चे
कहेंगे हमसे,
ओह पापा! यू'र आउट ऑफ़ डेट नाउ.

प्रणव कान्त, 28 अगस्त,1996.

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

अवलोकन

तुम
आती हो,
प्रतिदिन मेरे सामने.
हर दिन
निरखता हूँ मैं,
तुम्हारे
चंचल, निश्छल, निर्मल
चितवन को.
मैं देखता हूँ
तुम्हें-
कभी मुस्कुराते
तो कभी
तुम्हारी झील सी आँखों में
नज़र आते हैं
गर्म नमकीन अश्रुकण.
तुम्हारी
दोनों ही चेष्टाएँ
कहीं अन्दर तक
असर करती हैं
ह्रदय में मेरे.
कभी-कभी
चाहता है
मन मेरा कि
अपने प्यार की मुहर लगा दूँ
तुम्हारे हँसते होठों पर
और चुन लूँ
गिरते आब की हर बूँद को
आँखों से तुम्हारे.
कभी-कभी
चाहता हूँ मैं
कि
कह दूं तुमसे
अपने ह्रदय की सारी भावनाओं को
पर
ऐसा कुछ कहते
सिल जाते हैं होंठ मेरे
सहसा.
सोचता हूँ
कहीं बुरा न मान जाओ तुम;
जो लगेगा बुरा
मुझे भी;
इसलिए तो
अपनी हसरतों को
दिल में दबाए
बस निहारता हूँ,
तुमको मैं हमेशा
ख़ामोशी से.

प्रणव कान्त, ०७ नवम्बर, १९९७. 

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

परेशान हैं.

वो कहते हैं
अल्लाह के लिए
ही तो
उनकी जान है.
तुम कहते हो
भगवान् को ही
अर्पण
तुम्हारा प्राण है.
मैं कहता हूँ
वाक़ई, अगर
वो अल्लाह है
और
ये भगवान् हैं
तो
तुम दोनों ही से
उनका इम्तिहान है.
तुम
अगर भगवान् के लिए
अपने
प्राण दे ही दो.
वो
अगर अल्लाह के लिए
किसी की
जान ले ही लें.
मैं सोचता हूँ,
कैसा वो अल्लाह
और
कैसा ये भगवान् है?
अगर
हिंसा और दहशत
दोनों ही
इनके उन्वान हैं.
वाक़ई
जैसा कि
वो कहते है;
बस अल्लाह का कहा
वो करते हैं
और
जैसा कि
तुम कहते हो
भगवान् का कहा ही
तुम मानते हो.
वाक़ई
तुम्हारी मान्यताएं
और
उनके कर्म ही
अगर
भगवान् और अल्लाह की
पहचान हैं.
तो
मैं समझता हूँ
शुक्र है कि
ना वो मेरा अल्लाह है
और
ना ये मेरे भगवान् हैं
कि
जिनके
होने के सदके
इन्सान और इंसानियत
दोनों ही
परेशान हैं.

प्रणव कान्त. २९ जनवरी, २०१३.

सोमवार, 28 जनवरी 2013

समर्पण.

मेरे
ह्रदय के
पोर-पोर में,
सिर्फ़
तुम्हारा अस्तित्व है.
तुम
मेरी कल्पनाओं की
सृष्टि हो.
मैंने
तुममें देखा है;
अन्तर्निहित;
ताज़गी-फूलों की,
स्वच्छता-पर्वत से उतरती निर्झरिनी सी,
कोमलता और स्निग्धता-
हिमपातित बर्फ़ के फाहों सी,
और दृष्टिगत हुई है
मुझे उसमें
प्रेम की गर्माहट.
मैं
स्वप्नवीथियों में भी
ढूंढता हूँ तुमको
और
प्रातः
सूर्य की रश्मि के
स्पर्शाघात से
खुलते ही आँखें मेरी
प्रतीक्षारत हो जाती है
तुम्हारे लिए.
तुम आती हो,
आते ही बिखेरती हो,
अपने होठों की मधुमुस्कान.
मेरे लिए
होती है निहित जिसमें,
तुम्हारा समर्पण;
जिस पर है समर्पित,
मेरा ह्रदय भी.

प्रणव कान्त / १२ अक्तूबर १९९७.

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

टूटी कल्पना

हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

था सदियों से अपना भारत
ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ा.
'यह सूरज होता अस्त नहीं'
शासक था ख़ुद पर यूँ अकड़ा.
तुमने जब बड़ी वह तोड़ी
सोचा दुःख के बादल तो छटे.
एक आह सुनी, देखा हमने,
थे माँ के कोमल हाथ कटे.
दोनों काँधे थे रक्त सने
आँखों से अविरल अश्रु बहे.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

अंततः हमें स्वराज मिला
क्या बापू का सुराज मिला?
पहले तो लूटा ग़ैरों ने
अब लूटा है अपने पैरों ने.
मालिक जो नौकरशाह हुए
शक्ति पा लापरवाह हुए.
अधिकारों की बस चाह उन्हें
कर्तव्यों की कहाँ परवाह उन्हें?
जी भर वह शोषण करते हैं
स्वार्थों का पोषण करते हैं.
यहाँ ईमान का कोई ज़ोर नहीं
भ्रष्टाचारों का कोई छोर नहीं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

आयें जनप्रतिनिधियों को देखें
उनके करतूतों को परखें.
जनता के जो सरकार हैं ये
झूठे, गंदे, मक्कार हैं ये.
डाले समाज में ये फूटें
और दोनों हाथों से लूटें.
जाति की कोई गोटी फेंके
कोई धर्मों की रोटी सेंके.
जन्संपत्ति का करते भक्षण ये
अपराधों को दें संरक्षण ये.
सोचो निर्लज्ज ये कैसे हैं
थू है जिनपर ये वैसे हैं.
जनतंत्र का मंदिर है जहाँ
ये करते जूतम-पैजार वहाँ.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

इस धरती के असली वारिस
आज भी गाँवों में पड़े कराह रहे.
जनतंत्र के असली मालिक ये
अपने सेवक की राह तकें.
हर कोई इन्हें ही छलता है
इनके दम पर जो पलता है.
फिर भी ये तिल-तिल जलते हैं
काँटों की राह पे चलते हैं.
बस एक शाम चूल्हे जलते
बच्चे हैं दूध बिना पलते.
पृष्ठोदर एक हुए फिर भी
हैं सर पर बोझ लिए चलते.
आँखों में बुझती आस लिए
गिरते-उठते बस जीते हैं.
टूटे स्वप्नों की प्यास लिए
जीवन भर आंसू पीते हैं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?


प्रणव कान्त .
   

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

दस्तक

बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा,
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर.
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएँ,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें
या फिर
घड़ी की टिक-टिक चारों ओर.
सब कुछ पूर्ववत्
स्थिर, स्तब्ध,
सिवाय
एक समय के चलने की आवाज़ के.
यह भंग करती है सन्नाटे को
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक.
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों की झिरियों से
झांक रहीं हैं कुछ किरणें.
ये घड़ी की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा
कि
बंद दरवाज़ों
और गहरी नीरवता के पार
निखरी है दुनियां.
ये किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक
तोड़ ही देंगीं
सन्नाटों और अंधेरों से भरी
इस दुनियां के
बंद दरवाज़ों को
कभी-न-कभी.

प्रणव कान्त.

शनिवार, 19 जनवरी 2013

चक्रव्यूह

मेरा जीवन - 
एक महाभारत,
मेरा अवचेतन -
एक कुरुक्षेत्र,
जहाँ नित्य बनता है
संबंधों का चक्रव्यूह.
मैं 
अभिमन्यु की तरह 
भेदता हूँ
प्रतिदिन
चक्रव्यूह के छः द्वारों को 
पर
तोड़ नहीं पाता सातवें को 
भेदन का रहस्य 
जानकार भी.
पहुँच कर 
बिल्कुल पास 
अपनी लक्ष्यसिद्धि के 
घिर जाता हूँ मैं 
अपनी ही प्रश्नावीथियों में.
अपने ही 
प्रश्नों से संघर्षरत मैं -
यष्टिप्राण
हो जाता हूँ 
पर 
कर्तव्यबोध का संवेदन,
संचारित करता है
एक जिजीविषा
मेरे मन में.
मैं
एक बार पुनः
उत्प्रेरित होता हूँ 
एक प्रयास के लिए 
इस चक्रव्यूह भेदन का 
एक नए सिरे से.

प्रणव. 

प्रेरणा-1

एक 12-13 साल के लड़के को बहुत क्रोध आता था। उसके पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे क्रोध आए वो घर के सामने लगे पेड़ में वह कीलें ठोंक दे।
पहले दिन लड़के ने पेड़ में 30 कीलें ठोंकी। अगले कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण करना आ गया। अब वह पेड़ में प्रतिदिन इक्का-दुक्का कीलें ही ठोंकता था। उसे यह समझ में आ गया था कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना आसान था। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल दे।
लड़के ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं। जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गया। पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा – तुमने बहुत अच्छा काम किया, मेरे बेटे, लेकिन पेड़ के तने पर बने सैकडों कीलों के इन निशानों को देखो। अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे। अगर तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग भी लो तब भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा।
अपने मन-वचन-कर्म से कभी भी ऐसा कृत्य न करो जिसके लिए तुम्हें सदैव पछताना पड़े | क्रोध तो कमजोरी नहीं ताकत बनाओ|


प्रणव.

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

माँ, तुम याद आती हो.


जब भी
देखता हूँ
आकाश की ऊंचाई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
सोचता हूँ
समुद्र की गहराई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
धरती की विशालता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
महसूसता हूँ
सृष्टि की सुन्दरता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मिलता है
ईश्वर का वरदान कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
लगता है
आघात ह्रदय पर कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मूंदता हूँ आँखें
और
झुकाता हूँ
शीश; प्रार्थना के लिए -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
आईने में स्वयं को
माँ......ओ माँ
तुम......बस, तुम ही तो याद आती हो.

प्रणव कान्त.