गुरुवार, 18 जुलाई 2013

आज का मानव

मानव -
कल के मानव ने 
बनना चाहा प्रगतिशील,
परिकल्पना की विकास की, 
श्रम किया 
और 
श्रृंखला बना दी;
आविष्कारों की।
उसने 
सारे कार्यों को 
करवा लिया मशीनों से 
और अंततः 
बना वह आज का-
विकसित मानव।
इस 
प्रगति के होड़ में 
खो दिया उसने-
मानवता को, आदर्शों को, जीवनमूल्यों को 
और 
खोया उसने अपनी संस्कृति/संस्कारों को भी।
यहाँ तक कि 
तिलांजलि दे रहा वह;
पवित्र मानवीय भावनाओं की भी 
इस विकास की 
हुताग्नि में।
आज का मानव-
यंत्रों को रचते-रचते 
स्वयं भी बन गया,
एक यंत्र-मानव।
हाँ,
सचमुच यंत्र ही तो
बन गया वह,
क्योंकि 
यंत्र ही तो होते हैं-
भावनाओं से शून्य।
अक्सरहां
सोचता हूँ मैं,
कि आख़िर 
किन संस्कारों का धरोहर देगा यह 
अपने कल-
अपने भविष्य को?
पर,
कुछ तो देगा ही-
प्रेम नहीं; घृणा सही,
सत्य नहीं; मिथ्या सही,
दया नहीं; निर्ममता सही,
सहयोग नहीं; ईर्ष्या सही,
निश्छलता नहीं; धूर्तता सही,
मानवता नहीं; पशुता सही,  
रचनात्मकता नहीं; विध्वंसात्मकता सही,
कुछ तो देगा ही।
प्रगति की 
मृगमरीचिका में खोया-
आज का मानव,
क्या इन्हीं विषमताओं की नींव पर 
खड़ा करेगा 
अपना स्वप्न-महल?
यदि हाँ,
तो 
तनिक सोचे वह स्वयं ही,
कि 
परिणाम क्या होगा इसका?
सृष्टि क्या होगी उसकी?
कैसा कल, कैसे भविष्य को सिरजेगा वह?

प्रणव कान्त झा 
15 अगस्त, 1996.

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