गुरुवार, 16 मई 2013

इन्तिज़ार

इन्तिज़ार किया है,
नौ महीने मैंने
माँ  की कोख़  में पड़े-
ज़िन्दगी के लिए।
इन्तिज़ार में ही
जिए जा रहा हूँ,
साल-दर-साल
हरेक मुश्किल-ओ-मुसीबत से लड़ता
मौत के लिए-
जिसका कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं।
मगर,
ख़ुदा का वादा है
इंसान से-
ज़िन्दगी और मौत के लिए।
मैं कर लूँगा
इन्तिज़ार तुम्हारा भी-
ताक़यामत
कि
तुम भी कोई
वादा तो करो- ख़ुदा  की तरह।
ऐ ......सुनो,
सफ़र इन्तिज़ार का
मुश्किल है बहुत
कि
ये वादे ही तो
देते हैं ताक़त-
किसी के इन्तिज़ार के लिए।
ऐ .......सुनो,
कोई यकीन तो दो
अपने
वादे के पास रखने का
कि
ये यकीन ही तो
होता है सहारा-
किसी के इन्तिज़ार में।

प्रणव कान्त झा
08 जुलाई, 2004.

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