जब भी
देखता हूँ
आकाश की ऊंचाई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
सोचता हूँ
समुद्र की गहराई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
धरती की विशालता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
महसूसता हूँ
सृष्टि की सुन्दरता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मिलता है
ईश्वर का वरदान कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
लगता है
आघात ह्रदय पर कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मूंदता हूँ आँखें
और
झुकाता हूँ
शीश; प्रार्थना के लिए -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
आईने में स्वयं को
माँ......ओ माँ
तुम......बस, तुम ही तो याद आती हो.
प्रणव कान्त.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें