बहुत बेरहम है-
वक़्त,
और दो क़दम ज़्यादा उससे-
ये ज़िन्दगी।
जब तक चलते हैं,
इसके बनाए लीक पर
और नाचते इसके हाथों;
बहुत ख़ुशगवार
और पुरसुकूं होते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
जिसके उठे कदम मुख्तलिफ़
कि जो राह अपनी
ख़ुद बनाने चला अलग
कर देते हैं जीना अज़ाब-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
गर हालात चलें हमवार
और साथ चले
क़िस्मत का साया जिसके,
सामने घुटने टेक देते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
मैं भी चलता हूँ
अक्सर मुख़ालिफ़ इनके,
वाहिद ही ये ग़लती कि
हालात और क़िस्मत हमकदम नहीं होते;
फिर तो दोनों ने हराया है मुझे बारहां-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
एक ही ग़लती की सज़ा का सलीब
ढोते हुए कांधों पर बरसों
चलता जा रहा हूँ तन्हा
और उड़ाते हैं मेरा मज़ाक़-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
कभी-कभी सोचता हूँ
कि इस ज़िन्दगी से
तो न जीना बेहतर
मगर,
ये ना होती तो
मैं ऐसा सोचता कैसे?
कि मेरी हर सोच लिखने को
मुहैया है मुझे-
वक़्त बजरीये ज़िन्दगी।
प्रणव कान्त झा
04 सितम्बर, 2001.
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