बुधवार, 8 मई 2013

वक़्त और ज़िन्दगी

बहुत बेरहम है-
वक़्त,
और दो क़दम ज़्यादा उससे-
ये ज़िन्दगी।
जब तक चलते हैं,
इसके बनाए लीक पर 
और नाचते इसके हाथों;
बहुत ख़ुशगवार 
और पुरसुकूं होते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
जिसके उठे कदम मुख्तलिफ़ 
कि जो राह अपनी 
ख़ुद बनाने चला अलग 
कर देते हैं जीना अज़ाब-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
गर हालात चलें हमवार 
और साथ चले 
क़िस्मत  का साया जिसके,
सामने घुटने टेक देते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
मैं भी चलता हूँ 
अक्सर मुख़ालिफ़ इनके,
वाहिद ही ये ग़लती कि 
हालात और क़िस्मत हमकदम नहीं होते;
फिर तो दोनों ने हराया है मुझे बारहां-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
एक ही ग़लती  की सज़ा का सलीब 
ढोते हुए कांधों पर बरसों 
चलता जा रहा हूँ तन्हा
और उड़ाते हैं मेरा मज़ाक़-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
कभी-कभी सोचता हूँ 
कि इस ज़िन्दगी से 
तो न जीना बेहतर 
मगर, 
ये ना होती तो 
मैं ऐसा सोचता कैसे?
कि मेरी हर सोच लिखने को 
मुहैया है मुझे-
वक़्त बजरीये ज़िन्दगी।  

प्रणव कान्त झा 
04 सितम्बर, 2001. 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें