काश
एक क़दम
बस, एक क़दम
और चलता तो
सारा आकाश मेरी मुठ्ठी में बंद होता,
समंदर की लहरें मेरे पैर चूमतीं,
हवाएं मेरी साँसों में क़ैद होतीं,
मुहब्बतें मेरे सीने में बंद होतीं,
ज़माने का निज़ाम मेरे हाथों में होता
और
ज़िन्दगी नाचती मेरे इशारों पर
अगर
चल लेता मैं
बस, एक क़दम और।
एक क़दम;
बस
इसी एक क़दम के फ़ासले ने
उलट दी ज़िन्दगी मेरी।
बस
एक क़दम के फ़ासले ने
ख़ाली कर दिए मेरे हाथ,
खींच ली ज़मीन पैरों के नीचे से
और
कर दिया मज़बूर मुझे-
ज़िन्दगी के हाथों थमी डोर से बंधे
लट्टू की तरह नाचने को।
बस
एक क़दम का फ़ासला-
कितना छोटा फ़ासला?
पर
कितना मुश्किल है तय करना;
कि बस इसी
एक क़दम का फ़ासला होता है-
कामयाबी और नाकामयाबी के बीच,
रोशनी और तारीकी के बीच,
ज़मीन और खाई के बीच,
महफ़िल और तन्हाई के बीच,
शोहरत और रुसवाई के बीच,
ज़िन्दगी और मौत के बीच
और
बस एक ही क़दम का
तो फ़ासला होता है-
बन्दे और ख़ुदा के बीच।
प्रणव कान्त झा
22 जून, 2003.
एक क़दम
बस, एक क़दम
और चलता तो
सारा आकाश मेरी मुठ्ठी में बंद होता,
समंदर की लहरें मेरे पैर चूमतीं,
हवाएं मेरी साँसों में क़ैद होतीं,
मुहब्बतें मेरे सीने में बंद होतीं,
ज़माने का निज़ाम मेरे हाथों में होता
और
ज़िन्दगी नाचती मेरे इशारों पर
अगर
चल लेता मैं
बस, एक क़दम और।
एक क़दम;
बस
इसी एक क़दम के फ़ासले ने
उलट दी ज़िन्दगी मेरी।
बस
एक क़दम के फ़ासले ने
ख़ाली कर दिए मेरे हाथ,
खींच ली ज़मीन पैरों के नीचे से
और
कर दिया मज़बूर मुझे-
ज़िन्दगी के हाथों थमी डोर से बंधे
लट्टू की तरह नाचने को।
बस
एक क़दम का फ़ासला-
कितना छोटा फ़ासला?
पर
कितना मुश्किल है तय करना;
कि बस इसी
एक क़दम का फ़ासला होता है-
कामयाबी और नाकामयाबी के बीच,
रोशनी और तारीकी के बीच,
ज़मीन और खाई के बीच,
महफ़िल और तन्हाई के बीच,
शोहरत और रुसवाई के बीच,
ज़िन्दगी और मौत के बीच
और
बस एक ही क़दम का
तो फ़ासला होता है-
बन्दे और ख़ुदा के बीच।
प्रणव कान्त झा
22 जून, 2003.
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