शनिवार, 27 जुलाई 2013

परोपकार

एक चिड़िया 
थी बंद एक पिंजड़े में,
गा रही थी 
कोई गीत अपनी मुक्ति का
आर्त स्वर में अपने।
सुना उस स्वरलहरी को
एक पथिक ने
था चला जा रहा जो पास ही में
पथ पर अपने।
था वह क्लांत, व्यथित
तन और मन दोनों ही से
परन्तु
सुनकर पंछी के उस स्वर को
जाना उसने, उसका प्रणयगीत
और
पाया एक नया उत्साह
असीम;
लक्ष्य से मिलन का अपने।
आनंद से तिरोहित हो वह
चल पड़ा उल्लसित मन से
गंतव्य की ओर अपने
विस्मृत कर अपनी व्यथा।
पराधीनता की असह्य पीड़ा में भी
सुख-संतोष की अनुभूति जागी
ह्रदय के किसी कोने में - उस चिड़िया के,
देख कर
उस पथिक की ख़ुशी
और
चमक उसके आँखों की।

-प्रणव कान्त झा
07 नवम्बर, 1996.

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