शुक्रवार, 8 मार्च 2013

प्रकृति और पुरुष.

प्रकृति और पुरुष-
बैठे 
एकदिन
आमने-सामने.
पुरुष ने
शुरू कर दिया-
हिसाब-क़िताब
प्रकृति से.
जैसा कि
अक्सर ही
किया करता है वह;
आख़िरकार
वणिक जो ठहरा
सदा से.
पुरुष ने पूछा-
तुम्हें अंदाज़ा भी है
मेरी ताक़त का क्या?
मैंने तुम्हें
कहाँ से कहाँ
पहुँचाया
और
तुम तो बग़ैर मेरे
सोच भी
सकती क्या स्वयं को?
पुरुष ने
ख़ूब जताया,
बातों-बातों में
बताई-
प्रकृति को
उसकी औक़ात.
सारा दंभ,
सारा अहं,
सारे राग-उपराग
और
सारी धृष्टता
पुरुष की
सह ली पुनः
प्रकृति ने पूर्ववत्.
बिहुँसी
प्रकृति,
पूछा
बड़ी ही शीलता से-
हे पुरुष!
कभी सोचना ज़रा-
अगर
मैं चाहती ही नहीं
कि
सृजन हो तुम्हारा,
अगर
मैं चाहती ही नहीं
कि
पालन हो तुम्हारा
तो
मेरी ही छाती पर बैठ
क्या ये
आलंभ-उपालंभ,
राग-उपराग
और
आदेश-उपदेश
दे रहे होते तुम मुझे?
अगर
मैंने दिखाई ही नहीं होती
तुम्हें,
ये निस्सीम सृष्टि
तो
मुझे ही मेरी सीमा
क्या दिखा रहे होते तुम?
तो फिर,
कभी तो
शर्मिंदा भी हो जाओ
कृतघ्नता पर अपनी
ताकि
मुझे भी अपनी
दया, ममता, वात्सल्य, स्नेह, धैर्य
और
सृजन की क्षमता पर
शर्म और पछतावा
तो नहीं हो कभी!

@ प्रणव कान्त झा, ०८ मार्च, २०१३.