सोमवार, 27 मई 2013

जीवन-एक दृष्टिकोण-1

सुख का अनुगामी होता दुःख,
दुःख के बाद आता है सुख।
फ़िर क्यों हारे मानव, शाश्वत
कोमल ह्रदय विपत्ति के सन्मुख?

मन भी है शिशु के समान,
ढूंढता आलंब शैशवपन में।
आशा-विश्वास सँभालते उसको,
देते हैं सहारा यौवन में।

जीवन आशाओं की है दीपावली,
कुछ दीप जले जीवन न मिटे।
खोजो, बंद चक्षुपट खोलो,
मिल जाएगा नवदीप सखे।

सोने में कहाँ प्रतीक्षा है,
सोये को कभी-कुछ मिला कहीं?
अपनी पलकें बस खुली रखो,
है सच्ची लगन निष्फल न कभी,
शायद मिल जाए कोई अपना,
इस जीवनपथ में तुम्हें कहीं।

प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2002.


गुरुवार, 16 मई 2013

ज़िन्दा यादें

तुम,
तुम्हारा रूप सलोना,
खनकती हँसी तुम्हारी,
तुम्हारी मीठी बातें;
जो थीं, वादों की बारात-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
दूर जाने की बात पर
वो ग़ुस्सा तेरा,
चले जाने पर
इन्तिज़ार की बेक़रारी
और
देर से लौटने पर
वो रूठना तेरा,
फिर
हाथ जोड़ने से पहले
मान जाना तेरा-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
तुम्हारा
वो रेशमी छुअन,
गुलाबी होठों की गर्मी,
साँसों की गमक तुम्हारी;
मेरे शानों से लगकर
लिपटना तेरा
और फिर
वो बेक़रार तफ़्तीश
कि
"भूल जाओगे मुझे?"-
ज़िंदा  हैं हरपल
यादों में मेरी।
हर पल
ज़िन्दा  हैं
यादों में मेरी-
तेरी
वो कजरारी आँखें
कि
जिनमें
नशा है- एक अनोखे शराब सा।
इन
आँखों के
एकटक देखने का एहसास,
हरपल
बेचैन किये है मुझे।
लगता है
ऐसा
कि अब भी
पीछा करती हैं हरपल
वो आँखें तुम्हारी।
सोना .....जान .....लौट आओ;
गर
सुन रही हो मेरी सदा
कि
जुदा होकर भी,
हरपल
तेरे होने का एहसास
और
ये यादें तेरे कुरबत की
पागल कर देंगी मुझे।

प्रणव कान्त झा
22 जुलाई, 2004.

प्रतीक्षा

खुली रहती है,
आज भी
वो खिड़की,
जहाँ से बातें किया करते थे
हम दोनों।
खड़ा है,
आज भी
वह आम का पेड़,
टिक कर खड़ी होती थी
तुम जिससे
और
तका करती थी
राह मेरी।
सूना पड़ा है,
वह दरवाज़ा
आज भी
जहाँ से निहारा करती थी
तुम मुझे
जब तक
ओझल न हो जाता था मैं।
खुला रहता है,
आज भी
किवाड़ मेरे कमरे का
जहाँ से आकर
गुदगुदाती थी
तुम मुझे अल-सुब्ह
और
धरा करती थी थपकियाँ
गालों पर मेरे
जगाने को मुझे।
प्रतीक्षा है सबको
सिर्फ़  तुम्हारी,
आज भी
ऐसा लगता है-
निकल पड़ोगी झपाक से तुम
किसी कोने से
और
ख़त्म हो जाएगी
इनकी
चिरप्रतीक्षा।

प्रणव कान्त झा
19 जुलाई, 2004.

इन्तिज़ार

इन्तिज़ार किया है,
नौ महीने मैंने
माँ  की कोख़  में पड़े-
ज़िन्दगी के लिए।
इन्तिज़ार में ही
जिए जा रहा हूँ,
साल-दर-साल
हरेक मुश्किल-ओ-मुसीबत से लड़ता
मौत के लिए-
जिसका कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं।
मगर,
ख़ुदा का वादा है
इंसान से-
ज़िन्दगी और मौत के लिए।
मैं कर लूँगा
इन्तिज़ार तुम्हारा भी-
ताक़यामत
कि
तुम भी कोई
वादा तो करो- ख़ुदा  की तरह।
ऐ ......सुनो,
सफ़र इन्तिज़ार का
मुश्किल है बहुत
कि
ये वादे ही तो
देते हैं ताक़त-
किसी के इन्तिज़ार के लिए।
ऐ .......सुनो,
कोई यकीन तो दो
अपने
वादे के पास रखने का
कि
ये यकीन ही तो
होता है सहारा-
किसी के इन्तिज़ार में।

प्रणव कान्त झा
08 जुलाई, 2004.

चाहता हूँ मैं

मैं
अभिलाषित हूँ-
छूने को सीमाहीन, क्षितिजहीन
नीलगगन को
एक लम्बी उड़ान के बाद।
पर,
हूँ विवश मैं,
कतर दिए गए हैं पंख मेरे-
अपने कर्तव्यनिर्वाह के लिए।
मैं
उत्कंठित हूँ-
नापने को नीलहरित, तटहीन
वारिधि की
अथाह, निस्सीम गहराई को।
पर,
हूँ अवश मैं,
कर दिया गया हूँ हस्तपाद विच्छिन्न-
लोकलज्जा के भय से।
मैं
स्वप्निल हूँ-
क्षितिज मिलन को,
पाने को आत्मा की स्वतंत्रता;
विवशता की बेड़ियों में जकड़ा।
और तोड़कर
बंधनों को सारे
एक दिशाहीन, अंतहीन
यात्रा पर निकलना
चाहता हूँ मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 1998. 

बुधवार, 8 मई 2013

एक क़दम

काश
एक क़दम
बस, एक क़दम
और चलता तो
सारा आकाश मेरी मुठ्ठी में बंद होता,
समंदर की लहरें मेरे पैर चूमतीं,
हवाएं मेरी साँसों में क़ैद होतीं,
मुहब्बतें मेरे सीने में बंद होतीं,
ज़माने का निज़ाम मेरे हाथों में होता
और
ज़िन्दगी नाचती मेरे इशारों पर
अगर
चल लेता मैं
बस, एक क़दम और।
एक क़दम;
बस
इसी एक क़दम के फ़ासले ने
उलट दी ज़िन्दगी मेरी।
बस
एक क़दम के फ़ासले ने
ख़ाली कर दिए मेरे हाथ,
खींच ली ज़मीन पैरों के नीचे से
और
कर दिया मज़बूर मुझे-
ज़िन्दगी के हाथों थमी डोर से बंधे
लट्टू की तरह नाचने को।
बस
एक क़दम का फ़ासला-
कितना छोटा फ़ासला?
पर
कितना मुश्किल है तय करना;
कि बस इसी
एक क़दम का फ़ासला होता है-
कामयाबी और नाकामयाबी के बीच,
रोशनी और तारीकी के बीच,
ज़मीन और खाई के बीच,
महफ़िल और तन्हाई के बीच,
शोहरत और रुसवाई के बीच,
ज़िन्दगी और मौत के बीच
और
बस एक ही क़दम का
तो फ़ासला होता है-
बन्दे और ख़ुदा के बीच।

प्रणव कान्त झा
22 जून, 2003.
    

वक़्त और ज़िन्दगी

बहुत बेरहम है-
वक़्त,
और दो क़दम ज़्यादा उससे-
ये ज़िन्दगी।
जब तक चलते हैं,
इसके बनाए लीक पर 
और नाचते इसके हाथों;
बहुत ख़ुशगवार 
और पुरसुकूं होते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
जिसके उठे कदम मुख्तलिफ़ 
कि जो राह अपनी 
ख़ुद बनाने चला अलग 
कर देते हैं जीना अज़ाब-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
गर हालात चलें हमवार 
और साथ चले 
क़िस्मत  का साया जिसके,
सामने घुटने टेक देते हैं-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
मैं भी चलता हूँ 
अक्सर मुख़ालिफ़ इनके,
वाहिद ही ये ग़लती कि 
हालात और क़िस्मत हमकदम नहीं होते;
फिर तो दोनों ने हराया है मुझे बारहां-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
एक ही ग़लती  की सज़ा का सलीब 
ढोते हुए कांधों पर बरसों 
चलता जा रहा हूँ तन्हा
और उड़ाते हैं मेरा मज़ाक़-
वक़्त और ये ज़िन्दगी।
कभी-कभी सोचता हूँ 
कि इस ज़िन्दगी से 
तो न जीना बेहतर 
मगर, 
ये ना होती तो 
मैं ऐसा सोचता कैसे?
कि मेरी हर सोच लिखने को 
मुहैया है मुझे-
वक़्त बजरीये ज़िन्दगी।  

प्रणव कान्त झा 
04 सितम्बर, 2001. 

मंगलवार, 7 मई 2013

एहसास 2

क्यों
बयां करने को कोई दास्तां
लफ़्ज़  ज़रूरी होते हैं?
क्यों
कहने को किसी से दिल की बात
लफ़्ज़ ज़रूरी होते हैं?
कि
लफ़्ज़  होते हैं दिमाग़  की उपज
ये झूठे भी तो हो सकते हैं,
कोई कातिल भी हो सकता है
शीरींज़बान।
कोई क्यों नहीं समझता
किसी की आँखों की भाषा?
कोई क्यों नहीं पढता
किसी की आँखों में लिखी इबारत?
कोई क्यों नहीं देखता
किसी की आँखों में बसी अपनी ही तस्वीर?
कि
आँखें बोलती हैं दिल की ज़बान,
कि
आँखें ही सिर्फ़ सच बोलती हैं।
सुनने को लफ़्ज़ों की ज़बान,
ज़रूरी हैं दो कान-
ये धोखा भी दे देते हैं।
पर
समझने को आँखों की बातें-
ज़रूरी है; एक ख़ूबसूरत दिल,
कि
दिलों के एहसास-
कभी धोखा नहीं देते,
कि
कभी झूठे नहीं होते-
दिलों के एहसास।

प्रणव कान्त झा
04 जुलाई, 2004.
  

एहसास 1

ख़ुशबू को किसी ने नहीं देखा,
हवा को भी किसी ने नहीं देखा।
ममता को किसी ने नहीं देखा,
दुआ को भी किसी ने नहीं देखा।
इश्क़ को किसी ने नहीं देखा,
ख़ुदा को किसी ने देखा है क्या?
नहीं,
ये तो बस यक़ीन हैं;
पाने को इन्हें
ज़रुरत है एहसास की।
हाँ,
बस
एहसास ही काफ़ी है
इनके होने का।

प्रणव कान्त झा
28 जून, 2004.

हे ईश्वर ....क्यों?

हे ईश्वर,
सुना है- बड़े-बूढों से
हमेशा
पढ़ा है- किताबों में
हर जगह
कि
स्थित हो तुम स्वयं-
अपनी हर रचना में,
प्रकृति के कण-कण में
समाहित हो तुम।
फिर तो,
हर बार जब कोई हँसता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई रोता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई अच्छाई करता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई बुराई करता है-
तुम होते हो।
फिर तो,
अगर राम में तुम थे;
तो रावण में भी,
अगर मुहम्मद में तुम थे;
तो जहल में भी,
अगर ईसा में तुम ही थे;
तो फिरऔन में भी।
हे ईश्वर!
तुम ही अगर सृष्टि-नियंता हो
तो
ऐसा क्यों होता है?
क्यों तुम हमेशा
राम, मुहम्मद और ईसा ही नहीं होते?

प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2006.

दिल की बातें - 1

जख्म हर बार नए कुछ मिले गहरे
चल पड़ा जब भी मैं दवा  ढूँढने,
सांस घुटने सी लगी जब बैठे-बैठे
बाद मुद्दत के निकला मैं हवा ढूँढने।

हादसे ऐसे भी हैं ज़िन्दगी में मेरी
बज़ाहिर जो बेवजह तो हैं भी नहीं,
जाता हूँ उलझ अपने ही सवालों में
जब भी निकला हूँ  कोई वजह ढूँढने।

कुछ जुर्म किये तुमने सरेराह मेरी
जानती हो तुम उनकी तलाफ़ी है नहीं,
ख़ुद को भी पाता हूँ गुनाहगार कहीं
निकला तेरे वास्ते जब सज़ा ढूँढने।

इश्क़  में हासिल है सनम की वफ़ा
हर तरफ़ बस यही देखा है सुना,
मुझको तो मिले हैं सभी माहिरे जफ़ा
निकलूँ जब भी बावफ़ा ढूँढने।

अपनी ख़ुदी  भी साथ देती नहीं
जा रहा मैं जमाने की रजा  पाने,
हर नज़र ख़ाली, लब ख़ामोश यहाँ
किसे कहूँ कि चल प्यार की सदा ढूँढने।

प्रणव कान्त झा
२५ जून, २०१२



सोमवार, 6 मई 2013

आशा

बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा-
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर।
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएं,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें-
या फिर घड़ी की टिक-टिक चारों ओर।
सब कुछ पूर्ववत-
स्थिर, स्तब्ध-
सिवाय एक समय के चलने की आवाज़ के।
यह भंग करती है सन्नाटे को -
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक।
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों  की झीरियों से -
झाँक रहीं हैं कुछ किरणें।
यह घड़ी  की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा-
कि
बंद दरवाज़ों
और
गहरी नीरवता के पार-
निखरी है दुनियाँ।
इन किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक;
तोड़ ही देंगी
सन्नाटों और अंधेरों से भरी-
इस दुनियाँ के
बंद दरवाज़ों को;
कभी-ना-कभी।

प्रणव कान्त झा
२१ अप्रैल, २०१३।