मंगलवार, 7 मई 2013

हे ईश्वर ....क्यों?

हे ईश्वर,
सुना है- बड़े-बूढों से
हमेशा
पढ़ा है- किताबों में
हर जगह
कि
स्थित हो तुम स्वयं-
अपनी हर रचना में,
प्रकृति के कण-कण में
समाहित हो तुम।
फिर तो,
हर बार जब कोई हँसता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई रोता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई अच्छाई करता है-
तुम होते हो,
हर बार जब कोई बुराई करता है-
तुम होते हो।
फिर तो,
अगर राम में तुम थे;
तो रावण में भी,
अगर मुहम्मद में तुम थे;
तो जहल में भी,
अगर ईसा में तुम ही थे;
तो फिरऔन में भी।
हे ईश्वर!
तुम ही अगर सृष्टि-नियंता हो
तो
ऐसा क्यों होता है?
क्यों तुम हमेशा
राम, मुहम्मद और ईसा ही नहीं होते?

प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2006.

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