क्यों तूने चुनी वो राह मुसाफ़िर,
जिसकी कोई मंज़िल ही नहीं।
हमराह किया एक क़ातिल को,
ऐतबार के जो क़ाबिल ही नहीं।
हर पल पूजा जिसको तुमने,
और चाहा था हरदम जिसको।
सोचा था जिसे शरीक़-ए-दिल,
उसको थी वफ़ा हासिल ही नहीं।
क्यों सोच लिया तूने अहमक,
सच्ची चाहत मिलती सबको।
क़िस्मत में तेरी बस नफ़रत है,
है प्यार कहीं शामिल ही नहीं।
ये इश्क़ तो है दरिया ज़मज़म,
हर आशिक़ को कहते है सुना।
पर तेरे लिए वो समन्दर है,
है दूर तलक साहिल भी नहीं।
प्रणव कान्त झा
१० अगस्त, २०१३
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