गुरुवार, 28 जनवरी 2016

दिल की बातें - 12

जी ही लेता तेरे बग़ैर भी ज़िंदगी
जो ये सांसें तेरी असीर ना होतीं 

मिट ही जाती हस्ती दीवानों की
अगर आशिक़ी कबीर ना होतीं

लहलहाती जो इश्क़ की फ़सलें 
तो ये दुनियाँ यूँ फ़क़ीर ना होतीं

और कई सपने तामीर पा होते
ग़र कुछ नज़रें हक़ीर ना होतीं

बेनूर होते दिलों के दरीचे यहां
जो मोहब्बतें ख़ुद ज़हीर ना होती

- प्रणव कान्त झा
२८ जनवरी, २०१६.

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

चुनौती

हे 
तीनों लोकों के 
रचयिता, सर्वशक्तिमान!
जैसा कि 
असंख्य निर्दोष 
(और शातिर भी)
लोग कहते हैं तुम्हें।
तो 
अगर वाक़ई तुम हो, 
देख तो रहे ही होगे
कि
अपनी सत्ता की स्थापना को
जिनका निर्माण किया तुमने,
अपनी सत्ता हेतु उन्होंने भी
रच दिए हैं
तुम्हारे नाम पर
कई मान्यताओं के सत्ता केन्द्र-
संसार की शुद्धीकरण के लिए।
तो 
जो बना सकते थे,
दुनियाँ को और भी ख़ूबसूरत 
वो
तुम्हारे नाम से पैदा
शुद्धीकरण का मनोरोग ले
बना रहे दुनियाँ को - नरक।
तो 
जो दुनियाँ बनी थी
इंसानों के जीने को,
तुम,
तुम्हारे नाम से बावस्ता सत्ताएँ
यहाँ पैदा कर रही हैं - सड़ांध
कि 
जिनके मारे जीना दूभर है -
मानवता का।
तो 
अगर तुम हो 
(जैसा कि विश्वास है निर्दोषों को भी)
साबित करना ही होगा-
अपना अस्तित्व
तुम्हें 
बनानी होगी-
सुन्दर, शांतिमय दुनियाँ
और
भरना होगा प्यार-
नफ़रत के पुतलों में 
जैसा कि 
लिखा दिखता है-
तुम्हारे नाम की किताबों में।
नहीं तो
फिर
सही हूँ मैं 
कि 
तुम हो एक भ्रम
और
एक भ्रामक सत्ता के 
व्यामोह में फँसे लोग-
बरबाद कर देंगे
मेरी प्यारी दुनियां को,
(असंख्य निर्दोषों की भी)
जो
बन सकती है
और भी सुंदर, पुरसुकून,
तुम्हारी ग़ैरमौजूदगी में भी-
सिर्फ़ इंसानियत के दम से।

- प्रणव कान्त झा
२२ जनवरी, २०१६.


रविवार, 17 जनवरी 2016

मैथिली रचना - ९

ओहिना..... किछुओ....

पिया मोर जाथि
परदेस हो रामा
पिया रे बिदेसिया

कोना क' रहब हम 
पिया बिनु सखि हे
जिउते मरब हम
पिया बिनु सखि हे

मोदा मोर धनि त'
कठोर हो रामा
पिया रे बिदेसिया

ओ मोरा रसिया
हुनका कहत के
छथि मनबसिया
कहू से बुझत के

छथि मोरा पिया
बिसराह हो रामा
पिया रे बिदेसिया 

अगिला साओन ओ
नहि आओल जे
कोनो सौतिनि संग
ह'म पाओल जे

तजि देब अप्पन 
परान हो रामा
पिया परदेसिया

पिया मोर जाथि
परदेस हो रामा
पिया रे बिदेसिया

- प्रणव कान्त झा
१७ जनवरी, २०१६.

मैथिली रचना - ८

ओहिना....किछुओ....

आजु हे सखि
श्याम अओता
डाकल काग समाद हे
सुनह, आबह
हरखित मोन मोर
करह सोरहो सिंगार हे!

विरह कें दिन
बीतल हे अलि
आब जागल भाग हे
छल जे भासल
दुखित मोन मोर
मुदित गाओत राग हे!

नेह गोदल
मनहि हम सखि
नांओं गोदह भरि हाथ हे
नेम-व्रत हम
कयल सदिखन
संग रहथि मोरा नाथ हे!

- प्रणव कान्त झा
१० जनवरी, २०१६.


बुधवार, 6 जनवरी 2016

दिल की बातें - 11

बीता साल, गुज़रा वक़्त हँसते कुछ रोते
टूटे कई बार मगर रहे माबूद इरादे मेरे

दिखता हो जो आपको हूँ मैं दरअस्ल यही
ज़ाहिर हैं हमेशा कहाँ पोशीदा इरादे मेरे

हारा कई महाज़ जंग जीतने की ख़ातिर 
मेरी जद्दोजहद से परीशां रहे प्यादे मेरे

ये बात और कि माक़ूल वक़्त नहीं आया
क़ायम हैं अपनी जगह जो थे वादे मेरे

रहूँ मैं भी ख़ुश-चैन रहे सारी दुनियाँ मेरी
यही थोड़े तो हैं सपने कहाँ ज़्यादे मेरे

- प्रणव कान्त झा
०६ जनवरी, २०१६