हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
थे जीवनपथ के यात्री तुम
ना रहे कभी निःशब्द कहीं
वाणी तुम्हारी चुप न रही
लेखनी तुम्हारी रुक न सकी
फ़िर शब्दों को मौन छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
रहे जीवन भर यायावर तुम
और मृत्यु का आमंत्रण सुन
उससे भी दो-दो हाथ लड़े
जैसे जीवन भर अन्यायों से
अपने शब्दों के साथ लड़े
फ़िर हाथों का लेखन अस्त्र तोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
निर्मोह चले थे तुम हर पल
हर निर्बल को नव आस दिया
तुम ख़ुद कष्टों के बीच चले
सबके अधरों को हास दिया
फ़िर कोटि नयन में अश्रु छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
अपनी मिट्टी को अंतिम प्रणाम कर
तुम रूठ चले थे एकबार
पर माँ की ममता से बंधकर
तुम लौट आये फ़िर बार-बार
फ़िर माँ के आँचल से मुंह मोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आखिर चले गए?
तुम बसे हुए हो जन-जन में
कोई भी तुम्हें क्या भूलेगा?
उन्मुक्त हास की यादों में
सदियों जन-मानस झूलेगा
फ़िर-फ़िर आने की आशा दे
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
प्रणव कान्त झा
21 मार्च, 1999.
थे जीवनपथ के यात्री तुम
ना रहे कभी निःशब्द कहीं
वाणी तुम्हारी चुप न रही
लेखनी तुम्हारी रुक न सकी
फ़िर शब्दों को मौन छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
रहे जीवन भर यायावर तुम
और मृत्यु का आमंत्रण सुन
उससे भी दो-दो हाथ लड़े
जैसे जीवन भर अन्यायों से
अपने शब्दों के साथ लड़े
फ़िर हाथों का लेखन अस्त्र तोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
निर्मोह चले थे तुम हर पल
हर निर्बल को नव आस दिया
तुम ख़ुद कष्टों के बीच चले
सबके अधरों को हास दिया
फ़िर कोटि नयन में अश्रु छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
अपनी मिट्टी को अंतिम प्रणाम कर
तुम रूठ चले थे एकबार
पर माँ की ममता से बंधकर
तुम लौट आये फ़िर बार-बार
फ़िर माँ के आँचल से मुंह मोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आखिर चले गए?
तुम बसे हुए हो जन-जन में
कोई भी तुम्हें क्या भूलेगा?
उन्मुक्त हास की यादों में
सदियों जन-मानस झूलेगा
फ़िर-फ़िर आने की आशा दे
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?
प्रणव कान्त झा
21 मार्च, 1999.
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