बुधवार, 30 नवंबर 2016

दिल की बातें - 40

रग़ों के दौड़ते ख़ूं में उबाल आएगा
हम चुप रहें तो भी सवाल आएगा

ख़्वाह बन्द कर दो उठती आवाज़ें 
ख़ामोशियों से भी बवाल आएगा

सबके जज्बों को क़ैद कर बेशक
आज ख़ुश हो पर मलाल आएगा

तिरे ज़ुल्म से हैं जो दरहम-बरहम
उनके चेहरों पे भी जमाल आएगा

हो कितना भी रसूख़ ज़ालिम का
पर ज़ुल्मों का भी जवाल आएगा

आँसू नहीं ये, ऐसे राख़ हैं जिनमें 
दबे अंगारों में ही जलाल आएगा

रात कैसी भी हो सियह औ' लंबी
उजाला दिन का बहरहाल आएगा

जहाँ थे तुम कल वां आज है कोई
ना समझे गर वो ही काल आएगा

वक़्त ने तेरी भी क़ाबिलियत देखी
बंदा फिर कोई बाक़माल आएगा

हम रहें ना रहें पर देखना इक दिन
तुम्हें इन बातों का ख़याल आएगा

- प्रणव नार्मदेय 
३० नवम्बर, २०१६.

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

दिल की बातें - 39

क़तरा क़तरा बहता रहा मैं याद में
क़तरा क़तरा इस पिघलती रात में

यह तपिश उन तक रसाई पाए तो
क़तरा क़तरा दिल जला यूँ रात में 

है उम्र बीता जिसको रब से माँगते 
वो है दे गया बस यादें मेरे हाथ में

थी इश्क़ में शिद्दत नहीं शायद मेरे
कि दिल मेरा टूटा ज़रा सी बात में 

इस क़दर बरसी सबा हर फूल पर
हूँ ख़ाली दामन मैं रहा इस रात में

था दुआओं पर यक़ीं यूं तो उम्र भर
तेरी बद्दुआ फिर भी रही है साथ में 

- प्रणव नार्मदेय
०८ नवम्बर, २०१६.




सोमवार, 7 नवंबर 2016

मैथिली रचना - २५

व्यवस्था
********

जिनका 
होयबा'क छल -
कमल'क फूल सन सौम्य,
गुलाब'क फूल सन महमह
आकि
अड़हुल'क फूल सन गुनगर
से
भेल छथि -
कनैल'क फूल।
बरु
रंग जतेक होन्हि -
चोख; आँखि चकचौन्ह करयबला,
मोदा
डारि, पात होइ
कि
शिरा में बहैत द्रव;
अंतर'क गुण माहुरे सन घाती।
से 
होउन्ह कोना नहि?
जाहि सं पनघला
बीयो त'
अछि बिक्खे भरल ने?
ओना 
जे होई
लोक त' औखन
चोन्हियाएल अछि -
फूल'क चोखगर रंग सं।
जेना
काल्हि तक छल -
बेमत्त,
धथूर'क फूल सूंघि
आकि
ओकर बीया चीखि।
छी
पड़ल छगुन्ता में,
की कहिबै एकरा -
व्यवस्था'क भटरूप
आकि
भटरूप'क व्यवस्था!

- प्रणव नार्मदेय
०६ नवम्बर, २०१६.

शनिवार, 5 नवंबर 2016

दिल की बातें - 38

तुम क्या जानो हम पर अब तक क्या क्या बीता
इक बात कहूँ सब हार के मैं बस ख़ुद को जीता

अपने ही तो दिल मेरा यूं रहे लूटते गली गली में 
दे कर सबके सपन सुनहरे हाथ रहा है मेरा रीता

रग रग मेरा टूट रहा क्या जानूँ मैं कैसी थकन से
मन ये मेरा मरा बारहां जिस्म न जाने कैसे जीता

इतने घाव सहे दिल ने, रोएँगे हम किस किस पे
अब जो मिलता दर्द नया वह भी लगता है मीठा

साथ तुम्हारा एक ज़हर बन बैठा मेरी आदत ही
जाम ए मय एक शिफ़ा तुम बोलो मैं कैसे पीता

सब ही तो हैं मेरे अपने मेरे लिए है इश्क़ इबादत
ये कलमा पढ़ बैठा, क्या पढ़ता क़ुरआं ओ गीता

- प्रणव नार्मदेय
०५ नवम्बर, २०१६.


गुरुवार, 3 नवंबर 2016

मैथिली रचना - २४

आस'क टेमी
*************

बीत गेल-
ईहो सुकराती।
पछिला 
किछु बरख सं 
लाधल रहैछ गुजगुज अन्हरिया-
अनिश्चितता'क।
कखनहुं
बहय लगैछ अन्हर-बिहाड़ि-
घृणा आ अवसाद'क।
जे 
सरिपहुं लगाबैछ
अप्पन समुच्चा ज़ोर
मिझा देबा'क लेल;
पुरखा सं जोगाओल/जराओल-
नेह'क दीबा-बाति कें।
मोदा
कतबहु बरजोर
होमय
ई घोर अन्हरिया राति
किछु टेमी आस'क
तैयो जरैत अछि-
ता'धरि;
जा'धरि नहि होइछ-
एकटा न'ब बिहान
आ कि
नहि होइछ उग्रास-
प्रखर सुरुज'क;
न'ब नेहकिरिन संग।

- प्रणव नार्मदेय 
०२ नवम्बर, २०१६.