मंगलवार, 22 सितंबर 2015

दिल की बातें - 7

ये जो नसीहत दर नसीहत दे रहे हो
तो कभी मेरी जगह आकर ही देखो।

है मुझे हर पल यक़ीं इंसानियत पर
ये ईमां तुम भी ज़रा लाकर ही देखो।

नहीं आसां करना किसी पर ऐतबार
जिगरवाले हो, आज़मा कर ही देखो।

जो लगतीं ख़्वाबों की बातें अज़ीज़ी
बस इक ख़्वाब तुम पाकर ही देखो।

- प्रणव कान्त झा
२३ सितम्बर, २०१५

सोमवार, 14 सितंबर 2015

दिल की बातें - 6

ये ख़्वाबों ही का वक़त है जो हार मानता नहीं
वरना तो रोज़ ही इक जंग हराती उसे दुनियाँ
बड़े-बड़ों की बड़ी भूल, भूल जाते हैं जो अक़्सर
भूल छोटी भी हो हर वक़्त जताती उसे दुनियाँ
कि सारे ज़ुल्म सह के भी हंस ले तो है अच्छा
एक उफ़ के लिए क्या ना सुनाती उसे दुनियाँ
हादसात नामाकूल ज़िंदगी में जो कई उसके
बढ़ता है भूल कर तो खींच लाती उसे दुनियाँ
छोटी सी जंग जीत कर हो जाए जो मदहोश
कि शुक्रिया उसे औक़ात बताती है ये दुनियाँ
- प्रणव कान्त झा
१४ सितम्बर, २०१५.

शनिवार, 12 सितंबर 2015

पंछी और बहेलिए

बहेलियों ने
बिछा दिए हैं जाल
बिखेर के रंगीन दाने
भड़कीले और पसंदीदा।
पंछी 
जो दशकों से
रटते रहे सबक़,
भूल कर सब,
होने लगे हैं मदमस्त
दानों की ख़ुशबू से।
परख कर
इनका मिज़ाज
शातिर बहेलिए
निकाल फेंकेंगे
कुछ और
दिलचस्प दाने।
फिर तो
यक़ीनन
भूल कर इतिहासी सबक़
फँसेंगे ही जालों में -
ये पंछी, आदतन।
और
फँसकर फिर रटेंगे
सबक़ वही पुराना
कि
बहेलिये आएँगे,
दाना डालेंगे,
जाल बिछाएँगे
पर
उनमें फँसना नहीं।
जैसे
हो यही चिरंतन सत्य
पंछी और बहेलिए
के क़िस्से का
और
कोई बदलना भी कहाँ चाहता -
ना पंछी, ना बहेलिये।
-प्रणव कान्त झा
१२ सितम्बर, २०१५.