गुरुवार, 16 मई 2013

ज़िन्दा यादें

तुम,
तुम्हारा रूप सलोना,
खनकती हँसी तुम्हारी,
तुम्हारी मीठी बातें;
जो थीं, वादों की बारात-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
दूर जाने की बात पर
वो ग़ुस्सा तेरा,
चले जाने पर
इन्तिज़ार की बेक़रारी
और
देर से लौटने पर
वो रूठना तेरा,
फिर
हाथ जोड़ने से पहले
मान जाना तेरा-
ज़िंदा हैं हरपल
यादों में मेरी।
तुम्हारा
वो रेशमी छुअन,
गुलाबी होठों की गर्मी,
साँसों की गमक तुम्हारी;
मेरे शानों से लगकर
लिपटना तेरा
और फिर
वो बेक़रार तफ़्तीश
कि
"भूल जाओगे मुझे?"-
ज़िंदा  हैं हरपल
यादों में मेरी।
हर पल
ज़िन्दा  हैं
यादों में मेरी-
तेरी
वो कजरारी आँखें
कि
जिनमें
नशा है- एक अनोखे शराब सा।
इन
आँखों के
एकटक देखने का एहसास,
हरपल
बेचैन किये है मुझे।
लगता है
ऐसा
कि अब भी
पीछा करती हैं हरपल
वो आँखें तुम्हारी।
सोना .....जान .....लौट आओ;
गर
सुन रही हो मेरी सदा
कि
जुदा होकर भी,
हरपल
तेरे होने का एहसास
और
ये यादें तेरे कुरबत की
पागल कर देंगी मुझे।

प्रणव कान्त झा
22 जुलाई, 2004.

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