बुधवार, 29 अप्रैल 2015

मन का भूकम्प

पिछले
कुछ दिनों से,
प्रकृति के अन्याय
पर
कृतियों के आलंभ-उपालंभ
सुनते-पढ़ते
विचलित हो उठता है मन।
यह
जो हुआ,
पहले भी होता रहा
और शायद
आगे भी हो
क्योंकि
'क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया'
आख़िर
प्रकृति का ही नियम है - हमने पढ़ा, सीखा नहीं।
आज जीवन
क्षत-विक्षत है -
यहां-वहां,
जोह रहा है,
स्पर्श मानवता का
और
मानवता
काम भी कर रही अपना,
पर
हर तरफ़
व्याकुलता भरी है।
मन के अंदर -
मचा है भूकम्प फ़िर,
क्योंकि
कुछ बिना चोंच-पंजों के
गिद्ध-चील,
तैयार हैं
फ़िर -
इन अधमरों को नोंचने के लिए।
इन
भूखों की रोटियां
और
बेघरों के झोपड़े
बनने में
फ़िर
जाने कितना वक़्त और वक़त लगे
लेकिन
कुछ आलीशान बंगले बनेंगे -
जल्दी ही
शुरू होंगी पार्टियों की दौर -
इन चिताओं की आंच पर।

- प्रणव कान्त झा
29 अप्रैल, 2015

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

मैं मरा नहीं हूँ

भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

पलों ने बांधा था जो बाँध
वही अब खोल दिए हैं,
फिर उड़ने को नई उड़ान
लो पर तोल लिए हैं,
बाक़ी है जगह सपनों की, मैं भरा नहीं हूँ।

मुश्किल रस्ते हों लाख
फिर भी मैं चलूँगा,
तदबीर जो है हमराह
ना हाथों को मलूँगा,
जो सड़ जाये जीवनधार, मैं खड़ा नहीं हूँ।

अभी करते हैं जो उपहास
पराये भी, अपने भी,
देखा रोते इनको कई बार
टूटे इनके सपने भी,
थम के ठिठके हैं पांव ज़रा, मैं डरा नहीं हूँ।

धरे कोई मुझपे इल्ज़ाम
कि सपने लूट गया है,
ठोकर देकर कोई सोचे
कि मन टूट गया है,
सह लूँ हर बेज़ा जुल्म, मैं धरा नहीं हूँ।

था भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

- प्रणव कान्त झा
24 अप्रैल, 2015