बुधवार, 23 दिसंबर 2015

दिल की बातें -10

महकती शाम चहकती सुब्ह का शैदाई मैं
एक ख़राश मगर क़िस्मत के नगीने में रहा

आब ए ज़मज़म की तरह बाँटता जो ख़ुशी
ख़ुद ग़म के दरिया में भी टूटे सफ़ीने में रहा

ज़ार-बेज़ार किया इश्क़ मैंने जब भी किया
रेज़ा-रेज़ा हुआ दिल फिर भी क़रीने में रहा

ज़रा क्या दूर हुआ, ग़ीबत मेरी शुरू कर दी
और जो राज़ उसका, ज़ब्त मेरे सीने में रहा

उसकी क़ुरबत ने तो कई बार बेईमान किया
जो हुआ दूर, ईमान का सुक़ूं मेरे जीने में रहा

- प्रणव कान्त झा
२३ दिसंबर, २०१५.

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

दिल की बातें - 9

दुनियाँ को जान लेने का ना दावा कर
ख़ुद को ऐ नादां तू जान ले तो समझूँ
जो चाहती कि तुझे, जाने-माने दुनियाँ
ख़ुदी को ख़ुद की पहचान दे तो समझूँ
मान देते सभी को, जो मानते ख़ुद को
ज़रा सी बात जो तू मान ले तो समझूँ
होती है आजकल, जान लेने की बातें
ज़िन्द देते हुए कोई जान दे तो समझूँ
- प्रणव कान्त झा
०८ दिसंबर, २०१५.

मैथिली रचना - ७

ओहिना... किछुओ...
साओन-भादब बीतल हे
सखि आओल जाढ़
पिया सं दूर पियासल रे
मोन बिलमल ठाढ़ि
ठोर भरि मुस्की छारल रे
दृग भरल अखाढ़
धन सुनलहुं पिय अओता हे
धारल नब पाढ़ि
- प्रणव कान्त झा
०७ दिसंबर, २०१५.

दिल की बातें - 8

जुदा जो तुझसे हूँ तो दर्द बहुत है दिल में
साथ होने की भी क़ीमत तो सज़ा जैसी है।
तेरी हंसी, ये समझ रुह का वुज़ू है मेरे
तेरे आँसू, मेरी इबादत में क़ज़ा जैसी है।
मैं तो काफ़िर, है तुझे जो ईमां तो समझ
कि ये जुदाई भी ख़ुदाई की रज़ा जैसी है।
- प्रणव कान्त झा
१८ अक्तूबर, २०१५.

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

दिल की बातें - 7

ये जो नसीहत दर नसीहत दे रहे हो
तो कभी मेरी जगह आकर ही देखो।

है मुझे हर पल यक़ीं इंसानियत पर
ये ईमां तुम भी ज़रा लाकर ही देखो।

नहीं आसां करना किसी पर ऐतबार
जिगरवाले हो, आज़मा कर ही देखो।

जो लगतीं ख़्वाबों की बातें अज़ीज़ी
बस इक ख़्वाब तुम पाकर ही देखो।

- प्रणव कान्त झा
२३ सितम्बर, २०१५

सोमवार, 14 सितंबर 2015

दिल की बातें - 6

ये ख़्वाबों ही का वक़त है जो हार मानता नहीं
वरना तो रोज़ ही इक जंग हराती उसे दुनियाँ
बड़े-बड़ों की बड़ी भूल, भूल जाते हैं जो अक़्सर
भूल छोटी भी हो हर वक़्त जताती उसे दुनियाँ
कि सारे ज़ुल्म सह के भी हंस ले तो है अच्छा
एक उफ़ के लिए क्या ना सुनाती उसे दुनियाँ
हादसात नामाकूल ज़िंदगी में जो कई उसके
बढ़ता है भूल कर तो खींच लाती उसे दुनियाँ
छोटी सी जंग जीत कर हो जाए जो मदहोश
कि शुक्रिया उसे औक़ात बताती है ये दुनियाँ
- प्रणव कान्त झा
१४ सितम्बर, २०१५.

शनिवार, 12 सितंबर 2015

पंछी और बहेलिए

बहेलियों ने
बिछा दिए हैं जाल
बिखेर के रंगीन दाने
भड़कीले और पसंदीदा।
पंछी 
जो दशकों से
रटते रहे सबक़,
भूल कर सब,
होने लगे हैं मदमस्त
दानों की ख़ुशबू से।
परख कर
इनका मिज़ाज
शातिर बहेलिए
निकाल फेंकेंगे
कुछ और
दिलचस्प दाने।
फिर तो
यक़ीनन
भूल कर इतिहासी सबक़
फँसेंगे ही जालों में -
ये पंछी, आदतन।
और
फँसकर फिर रटेंगे
सबक़ वही पुराना
कि
बहेलिये आएँगे,
दाना डालेंगे,
जाल बिछाएँगे
पर
उनमें फँसना नहीं।
जैसे
हो यही चिरंतन सत्य
पंछी और बहेलिए
के क़िस्से का
और
कोई बदलना भी कहाँ चाहता -
ना पंछी, ना बहेलिये।
-प्रणव कान्त झा
१२ सितम्बर, २०१५.

सोमवार, 31 अगस्त 2015

मैथिली रचना - ६

अप्पन
माटि सं
उखरल छी बेबस
जड़ि मोदा
संग लागल अछि।
से
समय बरू
कत्तहु पटकय,
परिजन-पुरजन
कतबहु झटकय,
जौखन भेटत
कनिको
हवा-पानि;
पुन: जीबि-उठि,
चतरि-पसरि
ओत्तहि
फुलाय लागब
थेथर'क फूल जकां।
- प्रणव कान्त झा
३१ अगस्त, २०१५.

रविवार, 30 अगस्त 2015

फेरीवाले

कुछ दिनों से
फ़िर
गली-गली
हाँक लगाते फिर रहे हैं
वो ही पुराने, शातिर
फ़ेरीवाले
लिए कई तरह के रंगीन चश्में
बेचने को तैयार।
किसिम-किसिम के
चश्में हैं -
धर्म का चश्मा,
जाति का चश्मा,
ज़ोर का चश्मा,
गठजोड़ का चश्मा,
अभिमान का चश्मा,
स्वाभिमान का चश्मा,
क्षेत्रवाद का चश्मा,
राष्ट्रवाद का चश्मा
और हाँ
कुछ ऊँची क़ीमत के
विशिष्ट पैकेज़वाले चश्में भी तो हैं।
पूरा
रंग-बिरंगा
बाज़ार साथ लिए
फ़िर रहे हैं ये
बदरंग फेरीवाले
और
पता चला है
दारू, मुर्ग़ा, प्याज़ फ़्री वाला स्कीम भी है साथ में।
अब हम
दुनियाँ के स्वघोषित
प्राचीन बुद्धिमान लोग
(सुना है बुद्धि की नदी यहीं से बह कर दुनियाँ सींचती है)
ख़रीदेंगे पसंद के चश्में
रंगांध बुद्धि के लिए
ज़मीर को बेच कर भी।
और जब
उतरेगी क़लई चश्मों की
तो
करते रहेंगे
'बुद्धि का बधिया'
चौराहों, चौपालों, चैनलों
और
अख़बार के पन्नों पर;
जैसा करते आ रहे हैं
पिछले कई दशकों से।
प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१५.

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

मैथिली रचना - ५

'हे हौ!
भाग जे बदलत
से कोना?
हमरा आऊर कें त'
कुरहरि-कोदारि पारैत
भाग'क रेखे मेटा
जाइ है तरहत्थी सं' -
बाजल रहय
ओ अधबयसू किसान
सन'क जउर घोरैत।
चोट्टहि बाजल
कोदारि'क बेंट में गुल्ली ठोकैत
नबजुआन छौंड़ा -
'एह बाबू,
जे हाथ कुरहरि-कोदारि पारत
से कि तरहत्थी'क रेखक' भरसबे
काटत जिनगी!
आ कि घाम चुआ,
बांहिक' जोरे,
बज्जरो चास के छाती चीरि
पारत अप्पन भाग'क रेख अपनहि!'
मोंछ'क पम्ह सं चुबैत
घाम पोंछि,
कोदारि कें कन्हेठि,
चलि देलक ओ बाध दिस
कोनो नबका सिनेमा के तान टेरैत

देखैत रहलै ओकर पिता

किछु छोह सं आ किछु नेह सं
जा धरि ओझल नहि भलैक नजरि सं बेटा।
- प्रणव कान्त झा
१८ अगस्त, २०१५.

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

आज...पंद्रह अगस्त है

आज
फिर पंद्रह अगस्त है।
तो आओ,
लालकिले की प्राचीर से
सात तोपों की सलामी ले
लच्छेदार भाषणों से
अतीत पर
छद्म गौरव जताएँ
शहीदों के नाम
घड़ियाली आँसू बहाएँ
भविष्य के
चमकीले सपने बेच कर
वर्तमान के
मन को बरगलाएं।
फिर
कल से
कुर्सी के पीछे टंगे
शहीदों की तस्वीरों की
नाक के नीचे
लोक की हत्या करेंगे
तंत्र का सट्टा करेंगे
जन को लूट-खसोट
अपनी कोठी भरेंगे
गण को तोड़ेंगे
पुश्तों को तारेंगे
उजले मनों पर
कालिख फ़ेरेंगे।
- प्रणव कान्त झा
१५ अगस्त, २०१५.

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

ठूँठ से.... जीवन

ज़िंदगी
बेशक़ आज लग रही हो
कटे पेड़ के
ठूँठ सी -
नग्न, पत्रहीन,
सूखी, सड़ी, भद्दी
और श्रीहीन।
पर,
चूँकि जड़ें
अब भी धँसीं हैं
गहरी कहीं
अपनी मिट्टी में
और
खींच रहीं रस-गंध।
तो
ज़ाहिर है कि
बदलेगा मौसम
एक दिन
इस ठूँठ से भी जन्मेगा -
नव जीवन;
कोमल, सुन्दर, सुवासित
और
बंटेगा सबमें -
सुख, शीतलता, आनंद;
इसके श्री से।
- प्रणव कान्त झा
०१ अगस्त, २०१५.

श्रद्धांजलि - एक रत्न को

अपनी मिट्टी के कण-कण को
अपने जीवन के क्षण-क्षण से
उपकृत कर गए हे कृतज्ञ पुत्र
हम शोक क्यों करें!
थे मानव, अपनी क्षमता का
संपूर्ण प्रयोग कर मानव हित
हो गए सिद्ध तुम महाप्राण
हम शोक क्यों करें!
हर भेद भाव से ऊपर उठ
जीवन जीता कैसे मनुष्य
यह सिखा गए आदर्श पुरुष
हम शोक क्यों करें!
बच्चों सी निश्छलता भर कर
हो बाल हृदयों में आरोपित
बन गए प्रतिछाया लक्ष-लक्ष
हम शोक क्यों करें!
यौवन सा ऊर्जा लेकर तुम
सपने दे गए युवा जन को
सपनों संग तुम भी जीवित
हम शोक क्यों करें!
प्रकृति प्रदत्त तुम उपहार
प्रकृति सरीखा जीवन जी
हो गए समाहित प्रकृति में
हम गर्व ना करें!
- प्रणव कान्त झा
२८ जुलाई, २०१५.

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

ईश्वर...तुम हो?

जबकि
करोड़ों लोग
तरसते हों अन्न के बग़ैर,
बच्चे बिलबिलाते हों
भूख़ से कुपोषित हो 
और
तुमको नहला दिया जाता है
टनों घी-दूध
और
मनों चंदन, कुमकुम, रोली से
तो
सच कहना
जी तो मिचलाता होगा ना?
जबकि
लाखों लोग
सोते हों फ़ुटपाथ पर
बेघर ओ बार
सहते हुए धूप, वर्षा, सर्दी की मार
और
तुम्हारे नाम
कर दी जाती हैं
हज़ारों एकड़ ज़मीन,
बना दी जाती हैं
स्वर्णजड़ित अट्टालिकाएं
तो
सच कहना
लज्जा तो आती होगी ना?
जबकि
अरबों लोग
भटकते हों अज्ञानता के तमस में
बेरोज़ी - रोज़गार,
मरते हों एड़ियां रगड़
इलाज़ के बग़ैर हो बीमार
और
खरबों के हथियार ख़रीद
होता हो क़त्ल ओ गारद औ' खूंरेज़ी
मासूमों का; तुम्हारे सदक़े
तो
सच कहना
शर्म तो आती होगी ना?
नहीं तो
फ़िर सही हूँ मैं
कि
तुम हो सिर्फ़
एक निरूपित भ्रम
जिसे रचा है
बेहिस ओ बेईमानों ने
अपने
वर्चस्व के बर्बर
गोरखधंधे के लिए।
- प्रणव कान्त झा
२२ जुलाई, २०१५

रंगों के रंग

बचपन में
भौतिकी की किताब में
पढ़ा था -
प्रकाश के उजास
और 
इन्द्रधनुष की रंगीनी
का रहस्य -
'बै नी आ ह पी ना ला'
(बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल)
और
इन्हीं सात रंगों से
उपजे हैं -
प्रकृति के सबरंग।
फ़िर
ये भी सीखा
कि
रंग महज़ रंग ही
नहीं होते
बल्कि
ये होते हैं सन्देश -
शांति, समृद्धि, ज्ञान, उत्साह
और
प्रकृति का।
अब
जब सीख रहा हूँ
दुनियाँदारी
तो पता चला
कि
रंगों के तो और भी हैं
कई अज़ब रंग
कि
इनके भी होते हैं
अलग-अलग
धर्म, जाति और विचारधारा।
अब
रंग भी होते हैं -
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई;
रंग भी होते हैं -
सवर्ण, पसमांदा, दलित;
रंग होते हैं -
राष्ट्रवादी, समाजवादी और साम्यवादी भी।
पढ़ा था ये भी
कि
जब मिलते हैं सभी रंग इकट्ठे
तो
बनता है प्रकाश
और
फ़ैलता अंधियारा इनके अभाव में
पर
अब तो
तभी होते हैं ये साथ -
जब कालिख़ पोतना हो इंसानियत पर।
हाँ,
एक गुण अब भी है वैसा
कि
कालिख़ छुपी है सफ़ेदी के अंदर
और
जब भी वो आती है बाहर;
चहुँदिशि होता है रक्तिम लाल
और
इंसान का होता एक ही ठौर -
कफ़न की झक्क सफेदी।
- प्रणव कान्त झा
२१ जुलाई, २०१५.

स्पेस

रिश्तों में
'स्पेस'
अब बहुत
मायने रखता है।
पर
जब
तुम करती हो
'स्पेस' की बात
तो
बनती हो - क्रान्तिकारी और जुझारू
और
ग़र मैं तलाशता हूँ
'स्पेस'
तो
बनता हूँ - अत्याचारी, व्यभिचारी।
फ़िर
हो जाता है
मेरे लिए मुहाल
ज़िन्दगी का
'पेस' और 'पीस'।
- प्रणव कान्त झा
१६ जुलाई, २०१५.

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

संतरे जैसा देश

बचपन में
पढ़ा था
गुरु जी से
भूगोल की कक्षा में
कि 
पृथ्वी 'संतरे के समान' गोल है
और
सालों बाद
जब पढ़ा रहा था
नागरिक शास्त्र
बिटिया को
तो
ध्यान आया कि
पृथ्वी के इतर
मेरा देश भी है -
'संतरे के समान'।
संघीयता के
छिलके के अंदर,
क्षेत्रीयता के
खंड-खंड कोये में भी,
धर्मांधता, जातीयता और अहं के
दानों में विभक्त।
हर पांच साल में
सजी फ़सल
तोड़ते हैं
ठेकेदार (जातीय नेता)
और बेच देते हैं
ख़रीददारों (क्षेत्रीय क्षत्रप) को।
ये उपभोक्ता
हमेशा से
चूस कर इनकी
एकता और मानवता के
मीठे रस को,
नीरस कर देते हैं
और
भर देते हैं
अपने अंदर का ज़हर
लबालब।
फ़िर
जो भरपूर छिलका
कभी
मज़बूती से बांधे
रखता था कोयों को
अब
होता जा रहा कमज़ोर
हर नयी नस्ल के साथ
और
कभी भी
फ़ाड़ कर इसे
बिखर जाने को
तैयार बैठे हैं -
ज़हर भरे कोये।
- प्रणव कान्त झा
०९ जुलाई, २०१५.

मैथिली रचना - ४

खंड-खंड भेल मोन
खंड-खंड - बिस्वास
खंड-खंड - घ'र-आँगन
खंड-खंड - आस 
खंड-खंड भेल गाम

खंडित होयबाक छल जकरा
ओ अछि
अखण्ड -
पाखण्ड,
प्रचण्ड -
ईर्ष्या।
आब
आनह कतहुँ सं एकटा -
'नेमिचंद'
जे
खंड-खंड 'कबाड़ो' सं
बसाबथि
सुन्दर, कालजयी संसार।
- प्रणव कान्त झा
०७ जुलाई, २०१५.

रविवार, 21 जून 2015

पिता की पहचान

दुनियां के
बहुत सारे पिताओं की तरह,
आप नहीं हो -
उद्भट विद्वान,
कि
विरसे में दे सको
यशस्वी ज्ञान-विज्ञान।
ना ही हो आप -
अथाह धनवान,
कि
पीछे छोड़ जाओ
सपने ख़रीद लेने का भान।
कहाँ हो आप
इतने बड़े किसान,
कि
भरा होगा अन्न-धन
आँगन-खेत-खलिहान।
ऐसे भी नहीं आप -
विपुल शक्तिमान,
कि
जिसकी हनक से हो
सत्ता के गलियारों की पहचान।
मेरे
बाबू जी !
जो आप कभी नहीं कहते,
पर
जहाँ भी जाऊँ मैं,
लोग कहते है
कि
हो आप निहायत
सरल, सुहृद, विनयी इंसान,
जिस पर
गर्वित हूँ -
मैं; आपकी संतान।
कि
विरासत में
देना चाहूँगा मैं भी,
प्यारी बिटिया को,
एक ऐसे ही
पिता की पहचान।

- प्रणव कान्त झा
२१ जून, २०१५.

शनिवार, 9 मई 2015

माँ

माँ,
अपनी मिट्टी से 
दूर-देश 
हमेशा 
माथे पर अपने 
आशीष भरे तुम्हारे-
चुंबन की महक 
महसूस करता हूँ। 
दुनियांदारी के 
बोझ से लदा-थका 
जब लौटता हूँ घर ,
मेज पर पड़ी 
तेरी तस्वीर के साये-
स्नेहिल आंचल की हवा 
महसूस करता हूँ। 
रोज़ी-रोटी की 
आपाधापी में,
आज भी 
भटकने लगता हूँ 
जब भी रास्ता;
बचपन की मानिंद ,
सबक़ देती, घूरती-
तुम्हारी नज़रों की तपिश
महसूस करता हूँ। 
अब भी,
जब कभी चुभती हैं,
टूटे सपनों की किरचें-
सब्र देती हैं तुम्हारी सीख,
बचपन में जैसे,
कभी ठेस लगने पर ढाढ़स देते- 
तुम्हारे नर्म हाथों के लम्स 
महसूस करता हूँ। 
लगता है,
आज भी जुड़ा हूँ 
गर्भनाल से 
और 
स्पंदित है मेरा जीवन-
तुम्हारी ममता के स्पंदन से। 

- प्रणव कान्त झा 
09 मई, 2015   

शुक्रवार, 1 मई 2015

मज़दूर

इमारत की नींव
और 
मजदूरों में 
बड़ी समानता है,
कि 
जिस तरह जरूरी है 
बहुमंजिली इमारतों के लिए -
मज़बूत नींव,
वैसे ही जरूरी हैं 
बहुराष्ट्रीय धंधों के लिए -
मजबूर मज़दूर। 
वैसे, 
एक बड़ा फ़र्क़ भी है 
दोनों में,
कि 
जैसे बड़ी इमारत बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
नींव को मज़बूत करने में,
वैसे ही बड़ा धंधा बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
मजदूर को कमज़ोर करने में। 
शायद 
सबकी 
अपनी- अपनी 
ज़रूरत है 
और 
बाज़ार ज़रूरत ही से चलता है। 
पर 
जब भी 
मज़दूरों ने 
मजबूरी की सीमा लांघ ली,
बड़ी वातानुकूलित 
इमारतों के अंदर भी 
माथे पे पसीने आ जाते हैं,
क्योंकि,
बाज़ार तो 
'मांग और आपूर्ति' के नियम से  भी चलता है। 

- प्रणव कान्त झा 
01 मई, 2015. 

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

मन का भूकम्प

पिछले
कुछ दिनों से,
प्रकृति के अन्याय
पर
कृतियों के आलंभ-उपालंभ
सुनते-पढ़ते
विचलित हो उठता है मन।
यह
जो हुआ,
पहले भी होता रहा
और शायद
आगे भी हो
क्योंकि
'क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया'
आख़िर
प्रकृति का ही नियम है - हमने पढ़ा, सीखा नहीं।
आज जीवन
क्षत-विक्षत है -
यहां-वहां,
जोह रहा है,
स्पर्श मानवता का
और
मानवता
काम भी कर रही अपना,
पर
हर तरफ़
व्याकुलता भरी है।
मन के अंदर -
मचा है भूकम्प फ़िर,
क्योंकि
कुछ बिना चोंच-पंजों के
गिद्ध-चील,
तैयार हैं
फ़िर -
इन अधमरों को नोंचने के लिए।
इन
भूखों की रोटियां
और
बेघरों के झोपड़े
बनने में
फ़िर
जाने कितना वक़्त और वक़त लगे
लेकिन
कुछ आलीशान बंगले बनेंगे -
जल्दी ही
शुरू होंगी पार्टियों की दौर -
इन चिताओं की आंच पर।

- प्रणव कान्त झा
29 अप्रैल, 2015

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

मैं मरा नहीं हूँ

भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

पलों ने बांधा था जो बाँध
वही अब खोल दिए हैं,
फिर उड़ने को नई उड़ान
लो पर तोल लिए हैं,
बाक़ी है जगह सपनों की, मैं भरा नहीं हूँ।

मुश्किल रस्ते हों लाख
फिर भी मैं चलूँगा,
तदबीर जो है हमराह
ना हाथों को मलूँगा,
जो सड़ जाये जीवनधार, मैं खड़ा नहीं हूँ।

अभी करते हैं जो उपहास
पराये भी, अपने भी,
देखा रोते इनको कई बार
टूटे इनके सपने भी,
थम के ठिठके हैं पांव ज़रा, मैं डरा नहीं हूँ।

धरे कोई मुझपे इल्ज़ाम
कि सपने लूट गया है,
ठोकर देकर कोई सोचे
कि मन टूट गया है,
सह लूँ हर बेज़ा जुल्म, मैं धरा नहीं हूँ।

था भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

- प्रणव कान्त झा
24 अप्रैल, 2015 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

क़त्ल-ए-ख़ुदा

वो
हर बच्चा था -
मासूम,
नेकदिल और
पाकरूह;
ऐसा ही तो
होता होगा
ख़ुदा भी।
तो फिर
आज
यक़ीनन
ख़ुद को
ख़ुदा का बंदा
साबित करने को
कुछ सरफ़िरों ने
ख़ुदा को ही क़त्ल कर दिया।
तो फिर
क्या इस कुफ़्र के बाद भी
वो
अौरों को काफ़िर
कह पाएंगे?
अपनी
वहशत, दरिंदगी और ज़हालत
से जिहाद में नाक़ाम
ये रहज़न
फिर अौरों को
ज़िहाद सिखाएंगे?
बच्चों को
मौत,
मांओं को
आंसू
का दर्द देकर
ये दरिंदे
क्या अपने बच्चों और मांओं
से नज़र मिलाएंगे?
तो फिर
या ख़ुदाया!
ग़र तुम हो,
ख़ुद को
मोमिन कहने वाले
ये गुनाहगार
क्या वाक़ई तुम्हारी जन्नत
में जगह पाएंगे?
- प्रणव कान्त झा
17 दिसंबर, 2014.