शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैथिली रचना - १

उठू बटोही, ओहि बाट चलू,
जे बाट कियो देखल धरि नहिं,
अप्पन हियरा में ओ स्वप्न गढ़ू,
जे स्वप्न कियो सोचल धरि नहिं.

प्रकृति केर सुन्दरतम कृति छी आहां,
ई सुन्दरताक कोन अर्थ कहू?
अछि बिक्ख भरल आकंठ जतय,
ओ सोनक घट लय की करब कहू?

स्वार्थक लेल अहि धरती पर,
के नहिं कौखन यौ जीबैत अछि?
चिरंजीवी रहैत अछि वैह पुरुख,
नित आनक घाओ जे सीबैत अछि?

अछि बाट कठिन परिवर्तन केर,
ई आन्दोलन अछि सरल कतय?
सेज सजल अछि कांटक ई,
सुविधा सं भरल ई महल कतय?
जं लक्ष्य सबल अछि अंतस में,
पथ केर पाथर अछि अटल कतय?

हे वीर उठू, हुंकार करू,
हर विघ्न माथा कें झुका देत,
जं झुकय नहिं, प्रतिकार करू,
पाँछा पग अप्पन हटा लेत.

धीरज, दृढ़ता रखलहुं मोन में,
आहां विजयक अमृत पीयब यौ,
छी विजयीक वंशज आहां,
विजयी भैये कs जीयब यौ.

@ प्रणव कान्त झा.
०२ मार्च, २०१३.

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