मंगलवार, 22 जनवरी 2013

दस्तक

बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा,
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर.
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएँ,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें
या फिर
घड़ी की टिक-टिक चारों ओर.
सब कुछ पूर्ववत्
स्थिर, स्तब्ध,
सिवाय
एक समय के चलने की आवाज़ के.
यह भंग करती है सन्नाटे को
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक.
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों की झिरियों से
झांक रहीं हैं कुछ किरणें.
ये घड़ी की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा
कि
बंद दरवाज़ों
और गहरी नीरवता के पार
निखरी है दुनियां.
ये किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक
तोड़ ही देंगीं
सन्नाटों और अंधेरों से भरी
इस दुनियां के
बंद दरवाज़ों को
कभी-न-कभी.

प्रणव कान्त.

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