मेरे
ह्रदय के
पोर-पोर में,
सिर्फ़
तुम्हारा अस्तित्व है.
तुम
मेरी कल्पनाओं की
सृष्टि हो.
मैंने
तुममें देखा है;
अन्तर्निहित;
ताज़गी-फूलों की,
स्वच्छता-पर्वत से उतरती निर्झरिनी सी,
कोमलता और स्निग्धता-
हिमपातित बर्फ़ के फाहों सी,
और दृष्टिगत हुई है
मुझे उसमें
प्रेम की गर्माहट.
मैं
स्वप्नवीथियों में भी
ढूंढता हूँ तुमको
और
प्रातः
सूर्य की रश्मि के
स्पर्शाघात से
खुलते ही आँखें मेरी
प्रतीक्षारत हो जाती है
तुम्हारे लिए.
तुम आती हो,
आते ही बिखेरती हो,
अपने होठों की मधुमुस्कान.
मेरे लिए
होती है निहित जिसमें,
तुम्हारा समर्पण;
जिस पर है समर्पित,
मेरा ह्रदय भी.
प्रणव कान्त / १२ अक्तूबर १९९७.
ह्रदय के
पोर-पोर में,
सिर्फ़
तुम्हारा अस्तित्व है.
तुम
मेरी कल्पनाओं की
सृष्टि हो.
मैंने
तुममें देखा है;
अन्तर्निहित;
ताज़गी-फूलों की,
स्वच्छता-पर्वत से उतरती निर्झरिनी सी,
कोमलता और स्निग्धता-
हिमपातित बर्फ़ के फाहों सी,
और दृष्टिगत हुई है
मुझे उसमें
प्रेम की गर्माहट.
मैं
स्वप्नवीथियों में भी
ढूंढता हूँ तुमको
और
प्रातः
सूर्य की रश्मि के
स्पर्शाघात से
खुलते ही आँखें मेरी
प्रतीक्षारत हो जाती है
तुम्हारे लिए.
तुम आती हो,
आते ही बिखेरती हो,
अपने होठों की मधुमुस्कान.
मेरे लिए
होती है निहित जिसमें,
तुम्हारा समर्पण;
जिस पर है समर्पित,
मेरा ह्रदय भी.
प्रणव कान्त / १२ अक्तूबर १९९७.
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