खुली रहती है,
आज भी
वो खिड़की,
जहाँ से बातें किया करते थे
हम दोनों।
खड़ा है,
आज भी
वह आम का पेड़,
टिक कर खड़ी होती थी
तुम जिससे
और
तका करती थी
राह मेरी।
सूना पड़ा है,
वह दरवाज़ा
आज भी
जहाँ से निहारा करती थी
तुम मुझे
जब तक
ओझल न हो जाता था मैं।
खुला रहता है,
आज भी
किवाड़ मेरे कमरे का
जहाँ से आकर
गुदगुदाती थी
तुम मुझे अल-सुब्ह
और
धरा करती थी थपकियाँ
गालों पर मेरे
जगाने को मुझे।
प्रतीक्षा है सबको
सिर्फ़ तुम्हारी,
आज भी
ऐसा लगता है-
निकल पड़ोगी झपाक से तुम
किसी कोने से
और
ख़त्म हो जाएगी
इनकी
चिरप्रतीक्षा।
प्रणव कान्त झा
19 जुलाई, 2004.
आज भी
वो खिड़की,
जहाँ से बातें किया करते थे
हम दोनों।
खड़ा है,
आज भी
वह आम का पेड़,
टिक कर खड़ी होती थी
तुम जिससे
और
तका करती थी
राह मेरी।
सूना पड़ा है,
वह दरवाज़ा
आज भी
जहाँ से निहारा करती थी
तुम मुझे
जब तक
ओझल न हो जाता था मैं।
खुला रहता है,
आज भी
किवाड़ मेरे कमरे का
जहाँ से आकर
गुदगुदाती थी
तुम मुझे अल-सुब्ह
और
धरा करती थी थपकियाँ
गालों पर मेरे
जगाने को मुझे।
प्रतीक्षा है सबको
सिर्फ़ तुम्हारी,
आज भी
ऐसा लगता है-
निकल पड़ोगी झपाक से तुम
किसी कोने से
और
ख़त्म हो जाएगी
इनकी
चिरप्रतीक्षा।
प्रणव कान्त झा
19 जुलाई, 2004.
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