शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

ठूँठ से.... जीवन

ज़िंदगी
बेशक़ आज लग रही हो
कटे पेड़ के
ठूँठ सी -
नग्न, पत्रहीन,
सूखी, सड़ी, भद्दी
और श्रीहीन।
पर,
चूँकि जड़ें
अब भी धँसीं हैं
गहरी कहीं
अपनी मिट्टी में
और
खींच रहीं रस-गंध।
तो
ज़ाहिर है कि
बदलेगा मौसम
एक दिन
इस ठूँठ से भी जन्मेगा -
नव जीवन;
कोमल, सुन्दर, सुवासित
और
बंटेगा सबमें -
सुख, शीतलता, आनंद;
इसके श्री से।
- प्रणव कान्त झा
०१ अगस्त, २०१५.

श्रद्धांजलि - एक रत्न को

अपनी मिट्टी के कण-कण को
अपने जीवन के क्षण-क्षण से
उपकृत कर गए हे कृतज्ञ पुत्र
हम शोक क्यों करें!
थे मानव, अपनी क्षमता का
संपूर्ण प्रयोग कर मानव हित
हो गए सिद्ध तुम महाप्राण
हम शोक क्यों करें!
हर भेद भाव से ऊपर उठ
जीवन जीता कैसे मनुष्य
यह सिखा गए आदर्श पुरुष
हम शोक क्यों करें!
बच्चों सी निश्छलता भर कर
हो बाल हृदयों में आरोपित
बन गए प्रतिछाया लक्ष-लक्ष
हम शोक क्यों करें!
यौवन सा ऊर्जा लेकर तुम
सपने दे गए युवा जन को
सपनों संग तुम भी जीवित
हम शोक क्यों करें!
प्रकृति प्रदत्त तुम उपहार
प्रकृति सरीखा जीवन जी
हो गए समाहित प्रकृति में
हम गर्व ना करें!
- प्रणव कान्त झा
२८ जुलाई, २०१५.

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

ईश्वर...तुम हो?

जबकि
करोड़ों लोग
तरसते हों अन्न के बग़ैर,
बच्चे बिलबिलाते हों
भूख़ से कुपोषित हो 
और
तुमको नहला दिया जाता है
टनों घी-दूध
और
मनों चंदन, कुमकुम, रोली से
तो
सच कहना
जी तो मिचलाता होगा ना?
जबकि
लाखों लोग
सोते हों फ़ुटपाथ पर
बेघर ओ बार
सहते हुए धूप, वर्षा, सर्दी की मार
और
तुम्हारे नाम
कर दी जाती हैं
हज़ारों एकड़ ज़मीन,
बना दी जाती हैं
स्वर्णजड़ित अट्टालिकाएं
तो
सच कहना
लज्जा तो आती होगी ना?
जबकि
अरबों लोग
भटकते हों अज्ञानता के तमस में
बेरोज़ी - रोज़गार,
मरते हों एड़ियां रगड़
इलाज़ के बग़ैर हो बीमार
और
खरबों के हथियार ख़रीद
होता हो क़त्ल ओ गारद औ' खूंरेज़ी
मासूमों का; तुम्हारे सदक़े
तो
सच कहना
शर्म तो आती होगी ना?
नहीं तो
फ़िर सही हूँ मैं
कि
तुम हो सिर्फ़
एक निरूपित भ्रम
जिसे रचा है
बेहिस ओ बेईमानों ने
अपने
वर्चस्व के बर्बर
गोरखधंधे के लिए।
- प्रणव कान्त झा
२२ जुलाई, २०१५

रंगों के रंग

बचपन में
भौतिकी की किताब में
पढ़ा था -
प्रकाश के उजास
और 
इन्द्रधनुष की रंगीनी
का रहस्य -
'बै नी आ ह पी ना ला'
(बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल)
और
इन्हीं सात रंगों से
उपजे हैं -
प्रकृति के सबरंग।
फ़िर
ये भी सीखा
कि
रंग महज़ रंग ही
नहीं होते
बल्कि
ये होते हैं सन्देश -
शांति, समृद्धि, ज्ञान, उत्साह
और
प्रकृति का।
अब
जब सीख रहा हूँ
दुनियाँदारी
तो पता चला
कि
रंगों के तो और भी हैं
कई अज़ब रंग
कि
इनके भी होते हैं
अलग-अलग
धर्म, जाति और विचारधारा।
अब
रंग भी होते हैं -
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई;
रंग भी होते हैं -
सवर्ण, पसमांदा, दलित;
रंग होते हैं -
राष्ट्रवादी, समाजवादी और साम्यवादी भी।
पढ़ा था ये भी
कि
जब मिलते हैं सभी रंग इकट्ठे
तो
बनता है प्रकाश
और
फ़ैलता अंधियारा इनके अभाव में
पर
अब तो
तभी होते हैं ये साथ -
जब कालिख़ पोतना हो इंसानियत पर।
हाँ,
एक गुण अब भी है वैसा
कि
कालिख़ छुपी है सफ़ेदी के अंदर
और
जब भी वो आती है बाहर;
चहुँदिशि होता है रक्तिम लाल
और
इंसान का होता एक ही ठौर -
कफ़न की झक्क सफेदी।
- प्रणव कान्त झा
२१ जुलाई, २०१५.

स्पेस

रिश्तों में
'स्पेस'
अब बहुत
मायने रखता है।
पर
जब
तुम करती हो
'स्पेस' की बात
तो
बनती हो - क्रान्तिकारी और जुझारू
और
ग़र मैं तलाशता हूँ
'स्पेस'
तो
बनता हूँ - अत्याचारी, व्यभिचारी।
फ़िर
हो जाता है
मेरे लिए मुहाल
ज़िन्दगी का
'पेस' और 'पीस'।
- प्रणव कान्त झा
१६ जुलाई, २०१५.

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

संतरे जैसा देश

बचपन में
पढ़ा था
गुरु जी से
भूगोल की कक्षा में
कि 
पृथ्वी 'संतरे के समान' गोल है
और
सालों बाद
जब पढ़ा रहा था
नागरिक शास्त्र
बिटिया को
तो
ध्यान आया कि
पृथ्वी के इतर
मेरा देश भी है -
'संतरे के समान'।
संघीयता के
छिलके के अंदर,
क्षेत्रीयता के
खंड-खंड कोये में भी,
धर्मांधता, जातीयता और अहं के
दानों में विभक्त।
हर पांच साल में
सजी फ़सल
तोड़ते हैं
ठेकेदार (जातीय नेता)
और बेच देते हैं
ख़रीददारों (क्षेत्रीय क्षत्रप) को।
ये उपभोक्ता
हमेशा से
चूस कर इनकी
एकता और मानवता के
मीठे रस को,
नीरस कर देते हैं
और
भर देते हैं
अपने अंदर का ज़हर
लबालब।
फ़िर
जो भरपूर छिलका
कभी
मज़बूती से बांधे
रखता था कोयों को
अब
होता जा रहा कमज़ोर
हर नयी नस्ल के साथ
और
कभी भी
फ़ाड़ कर इसे
बिखर जाने को
तैयार बैठे हैं -
ज़हर भरे कोये।
- प्रणव कान्त झा
०९ जुलाई, २०१५.

मैथिली रचना - ४

खंड-खंड भेल मोन
खंड-खंड - बिस्वास
खंड-खंड - घ'र-आँगन
खंड-खंड - आस 
खंड-खंड भेल गाम

खंडित होयबाक छल जकरा
ओ अछि
अखण्ड -
पाखण्ड,
प्रचण्ड -
ईर्ष्या।
आब
आनह कतहुँ सं एकटा -
'नेमिचंद'
जे
खंड-खंड 'कबाड़ो' सं
बसाबथि
सुन्दर, कालजयी संसार।
- प्रणव कान्त झा
०७ जुलाई, २०१५.