तुम
आती हो,
प्रतिदिन मेरे सामने.
हर दिन
निरखता हूँ मैं,
तुम्हारे
चंचल, निश्छल, निर्मल
चितवन को.
मैं देखता हूँ
तुम्हें-
कभी मुस्कुराते
तो कभी
तुम्हारी झील सी आँखों में
नज़र आते हैं
गर्म नमकीन अश्रुकण.
तुम्हारी
दोनों ही चेष्टाएँ
कहीं अन्दर तक
असर करती हैं
ह्रदय में मेरे.
कभी-कभी
चाहता है
मन मेरा कि
अपने प्यार की मुहर लगा दूँ
तुम्हारे हँसते होठों पर
और चुन लूँ
गिरते आब की हर बूँद को
आँखों से तुम्हारे.
कभी-कभी
चाहता हूँ मैं
कि
कह दूं तुमसे
अपने ह्रदय की सारी भावनाओं को
पर
ऐसा कुछ कहते
सिल जाते हैं होंठ मेरे
सहसा.
सोचता हूँ
कहीं बुरा न मान जाओ तुम;
जो लगेगा बुरा
मुझे भी;
इसलिए तो
अपनी हसरतों को
दिल में दबाए
बस निहारता हूँ,
तुमको मैं हमेशा
ख़ामोशी से.
प्रणव कान्त, ०७ नवम्बर, १९९७.
आती हो,
प्रतिदिन मेरे सामने.
हर दिन
निरखता हूँ मैं,
तुम्हारे
चंचल, निश्छल, निर्मल
चितवन को.
मैं देखता हूँ
तुम्हें-
कभी मुस्कुराते
तो कभी
तुम्हारी झील सी आँखों में
नज़र आते हैं
गर्म नमकीन अश्रुकण.
तुम्हारी
दोनों ही चेष्टाएँ
कहीं अन्दर तक
असर करती हैं
ह्रदय में मेरे.
कभी-कभी
चाहता है
मन मेरा कि
अपने प्यार की मुहर लगा दूँ
तुम्हारे हँसते होठों पर
और चुन लूँ
गिरते आब की हर बूँद को
आँखों से तुम्हारे.
कभी-कभी
चाहता हूँ मैं
कि
कह दूं तुमसे
अपने ह्रदय की सारी भावनाओं को
पर
ऐसा कुछ कहते
सिल जाते हैं होंठ मेरे
सहसा.
सोचता हूँ
कहीं बुरा न मान जाओ तुम;
जो लगेगा बुरा
मुझे भी;
इसलिए तो
अपनी हसरतों को
दिल में दबाए
बस निहारता हूँ,
तुमको मैं हमेशा
ख़ामोशी से.
प्रणव कान्त, ०७ नवम्बर, १९९७.