गुरुवार, 31 जनवरी 2013

अवलोकन

तुम
आती हो,
प्रतिदिन मेरे सामने.
हर दिन
निरखता हूँ मैं,
तुम्हारे
चंचल, निश्छल, निर्मल
चितवन को.
मैं देखता हूँ
तुम्हें-
कभी मुस्कुराते
तो कभी
तुम्हारी झील सी आँखों में
नज़र आते हैं
गर्म नमकीन अश्रुकण.
तुम्हारी
दोनों ही चेष्टाएँ
कहीं अन्दर तक
असर करती हैं
ह्रदय में मेरे.
कभी-कभी
चाहता है
मन मेरा कि
अपने प्यार की मुहर लगा दूँ
तुम्हारे हँसते होठों पर
और चुन लूँ
गिरते आब की हर बूँद को
आँखों से तुम्हारे.
कभी-कभी
चाहता हूँ मैं
कि
कह दूं तुमसे
अपने ह्रदय की सारी भावनाओं को
पर
ऐसा कुछ कहते
सिल जाते हैं होंठ मेरे
सहसा.
सोचता हूँ
कहीं बुरा न मान जाओ तुम;
जो लगेगा बुरा
मुझे भी;
इसलिए तो
अपनी हसरतों को
दिल में दबाए
बस निहारता हूँ,
तुमको मैं हमेशा
ख़ामोशी से.

प्रणव कान्त, ०७ नवम्बर, १९९७. 

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

परेशान हैं.

वो कहते हैं
अल्लाह के लिए
ही तो
उनकी जान है.
तुम कहते हो
भगवान् को ही
अर्पण
तुम्हारा प्राण है.
मैं कहता हूँ
वाक़ई, अगर
वो अल्लाह है
और
ये भगवान् हैं
तो
तुम दोनों ही से
उनका इम्तिहान है.
तुम
अगर भगवान् के लिए
अपने
प्राण दे ही दो.
वो
अगर अल्लाह के लिए
किसी की
जान ले ही लें.
मैं सोचता हूँ,
कैसा वो अल्लाह
और
कैसा ये भगवान् है?
अगर
हिंसा और दहशत
दोनों ही
इनके उन्वान हैं.
वाक़ई
जैसा कि
वो कहते है;
बस अल्लाह का कहा
वो करते हैं
और
जैसा कि
तुम कहते हो
भगवान् का कहा ही
तुम मानते हो.
वाक़ई
तुम्हारी मान्यताएं
और
उनके कर्म ही
अगर
भगवान् और अल्लाह की
पहचान हैं.
तो
मैं समझता हूँ
शुक्र है कि
ना वो मेरा अल्लाह है
और
ना ये मेरे भगवान् हैं
कि
जिनके
होने के सदके
इन्सान और इंसानियत
दोनों ही
परेशान हैं.

प्रणव कान्त. २९ जनवरी, २०१३.

सोमवार, 28 जनवरी 2013

समर्पण.

मेरे
ह्रदय के
पोर-पोर में,
सिर्फ़
तुम्हारा अस्तित्व है.
तुम
मेरी कल्पनाओं की
सृष्टि हो.
मैंने
तुममें देखा है;
अन्तर्निहित;
ताज़गी-फूलों की,
स्वच्छता-पर्वत से उतरती निर्झरिनी सी,
कोमलता और स्निग्धता-
हिमपातित बर्फ़ के फाहों सी,
और दृष्टिगत हुई है
मुझे उसमें
प्रेम की गर्माहट.
मैं
स्वप्नवीथियों में भी
ढूंढता हूँ तुमको
और
प्रातः
सूर्य की रश्मि के
स्पर्शाघात से
खुलते ही आँखें मेरी
प्रतीक्षारत हो जाती है
तुम्हारे लिए.
तुम आती हो,
आते ही बिखेरती हो,
अपने होठों की मधुमुस्कान.
मेरे लिए
होती है निहित जिसमें,
तुम्हारा समर्पण;
जिस पर है समर्पित,
मेरा ह्रदय भी.

प्रणव कान्त / १२ अक्तूबर १९९७.

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

टूटी कल्पना

हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

था सदियों से अपना भारत
ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ा.
'यह सूरज होता अस्त नहीं'
शासक था ख़ुद पर यूँ अकड़ा.
तुमने जब बड़ी वह तोड़ी
सोचा दुःख के बादल तो छटे.
एक आह सुनी, देखा हमने,
थे माँ के कोमल हाथ कटे.
दोनों काँधे थे रक्त सने
आँखों से अविरल अश्रु बहे.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

अंततः हमें स्वराज मिला
क्या बापू का सुराज मिला?
पहले तो लूटा ग़ैरों ने
अब लूटा है अपने पैरों ने.
मालिक जो नौकरशाह हुए
शक्ति पा लापरवाह हुए.
अधिकारों की बस चाह उन्हें
कर्तव्यों की कहाँ परवाह उन्हें?
जी भर वह शोषण करते हैं
स्वार्थों का पोषण करते हैं.
यहाँ ईमान का कोई ज़ोर नहीं
भ्रष्टाचारों का कोई छोर नहीं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

आयें जनप्रतिनिधियों को देखें
उनके करतूतों को परखें.
जनता के जो सरकार हैं ये
झूठे, गंदे, मक्कार हैं ये.
डाले समाज में ये फूटें
और दोनों हाथों से लूटें.
जाति की कोई गोटी फेंके
कोई धर्मों की रोटी सेंके.
जन्संपत्ति का करते भक्षण ये
अपराधों को दें संरक्षण ये.
सोचो निर्लज्ज ये कैसे हैं
थू है जिनपर ये वैसे हैं.
जनतंत्र का मंदिर है जहाँ
ये करते जूतम-पैजार वहाँ.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?

इस धरती के असली वारिस
आज भी गाँवों में पड़े कराह रहे.
जनतंत्र के असली मालिक ये
अपने सेवक की राह तकें.
हर कोई इन्हें ही छलता है
इनके दम पर जो पलता है.
फिर भी ये तिल-तिल जलते हैं
काँटों की राह पे चलते हैं.
बस एक शाम चूल्हे जलते
बच्चे हैं दूध बिना पलते.
पृष्ठोदर एक हुए फिर भी
हैं सर पर बोझ लिए चलते.
आँखों में बुझती आस लिए
गिरते-उठते बस जीते हैं.
टूटे स्वप्नों की प्यास लिए
जीवन भर आंसू पीते हैं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?


प्रणव कान्त .
   

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

दस्तक

बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा,
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर.
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएँ,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें
या फिर
घड़ी की टिक-टिक चारों ओर.
सब कुछ पूर्ववत्
स्थिर, स्तब्ध,
सिवाय
एक समय के चलने की आवाज़ के.
यह भंग करती है सन्नाटे को
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक.
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों की झिरियों से
झांक रहीं हैं कुछ किरणें.
ये घड़ी की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा
कि
बंद दरवाज़ों
और गहरी नीरवता के पार
निखरी है दुनियां.
ये किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक
तोड़ ही देंगीं
सन्नाटों और अंधेरों से भरी
इस दुनियां के
बंद दरवाज़ों को
कभी-न-कभी.

प्रणव कान्त.

शनिवार, 19 जनवरी 2013

चक्रव्यूह

मेरा जीवन - 
एक महाभारत,
मेरा अवचेतन -
एक कुरुक्षेत्र,
जहाँ नित्य बनता है
संबंधों का चक्रव्यूह.
मैं 
अभिमन्यु की तरह 
भेदता हूँ
प्रतिदिन
चक्रव्यूह के छः द्वारों को 
पर
तोड़ नहीं पाता सातवें को 
भेदन का रहस्य 
जानकार भी.
पहुँच कर 
बिल्कुल पास 
अपनी लक्ष्यसिद्धि के 
घिर जाता हूँ मैं 
अपनी ही प्रश्नावीथियों में.
अपने ही 
प्रश्नों से संघर्षरत मैं -
यष्टिप्राण
हो जाता हूँ 
पर 
कर्तव्यबोध का संवेदन,
संचारित करता है
एक जिजीविषा
मेरे मन में.
मैं
एक बार पुनः
उत्प्रेरित होता हूँ 
एक प्रयास के लिए 
इस चक्रव्यूह भेदन का 
एक नए सिरे से.

प्रणव. 

प्रेरणा-1

एक 12-13 साल के लड़के को बहुत क्रोध आता था। उसके पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे क्रोध आए वो घर के सामने लगे पेड़ में वह कीलें ठोंक दे।
पहले दिन लड़के ने पेड़ में 30 कीलें ठोंकी। अगले कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण करना आ गया। अब वह पेड़ में प्रतिदिन इक्का-दुक्का कीलें ही ठोंकता था। उसे यह समझ में आ गया था कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना आसान था। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल दे।
लड़के ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं। जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गया। पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा – तुमने बहुत अच्छा काम किया, मेरे बेटे, लेकिन पेड़ के तने पर बने सैकडों कीलों के इन निशानों को देखो। अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे। अगर तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग भी लो तब भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा।
अपने मन-वचन-कर्म से कभी भी ऐसा कृत्य न करो जिसके लिए तुम्हें सदैव पछताना पड़े | क्रोध तो कमजोरी नहीं ताकत बनाओ|


प्रणव.

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

माँ, तुम याद आती हो.


जब भी
देखता हूँ
आकाश की ऊंचाई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
सोचता हूँ
समुद्र की गहराई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
धरती की विशालता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
महसूसता हूँ
सृष्टि की सुन्दरता -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मिलता है
ईश्वर का वरदान कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
लगता है
आघात ह्रदय पर कोई -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
मूंदता हूँ आँखें
और
झुकाता हूँ
शीश; प्रार्थना के लिए -
माँ, तुम याद आती हो.
जब भी
देखता हूँ
आईने में स्वयं को
माँ......ओ माँ
तुम......बस, तुम ही तो याद आती हो.

प्रणव कान्त.