सोमवार, 31 अगस्त 2015

मैथिली रचना - ६

अप्पन
माटि सं
उखरल छी बेबस
जड़ि मोदा
संग लागल अछि।
से
समय बरू
कत्तहु पटकय,
परिजन-पुरजन
कतबहु झटकय,
जौखन भेटत
कनिको
हवा-पानि;
पुन: जीबि-उठि,
चतरि-पसरि
ओत्तहि
फुलाय लागब
थेथर'क फूल जकां।
- प्रणव कान्त झा
३१ अगस्त, २०१५.

रविवार, 30 अगस्त 2015

फेरीवाले

कुछ दिनों से
फ़िर
गली-गली
हाँक लगाते फिर रहे हैं
वो ही पुराने, शातिर
फ़ेरीवाले
लिए कई तरह के रंगीन चश्में
बेचने को तैयार।
किसिम-किसिम के
चश्में हैं -
धर्म का चश्मा,
जाति का चश्मा,
ज़ोर का चश्मा,
गठजोड़ का चश्मा,
अभिमान का चश्मा,
स्वाभिमान का चश्मा,
क्षेत्रवाद का चश्मा,
राष्ट्रवाद का चश्मा
और हाँ
कुछ ऊँची क़ीमत के
विशिष्ट पैकेज़वाले चश्में भी तो हैं।
पूरा
रंग-बिरंगा
बाज़ार साथ लिए
फ़िर रहे हैं ये
बदरंग फेरीवाले
और
पता चला है
दारू, मुर्ग़ा, प्याज़ फ़्री वाला स्कीम भी है साथ में।
अब हम
दुनियाँ के स्वघोषित
प्राचीन बुद्धिमान लोग
(सुना है बुद्धि की नदी यहीं से बह कर दुनियाँ सींचती है)
ख़रीदेंगे पसंद के चश्में
रंगांध बुद्धि के लिए
ज़मीर को बेच कर भी।
और जब
उतरेगी क़लई चश्मों की
तो
करते रहेंगे
'बुद्धि का बधिया'
चौराहों, चौपालों, चैनलों
और
अख़बार के पन्नों पर;
जैसा करते आ रहे हैं
पिछले कई दशकों से।
प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१५.

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

मैथिली रचना - ५

'हे हौ!
भाग जे बदलत
से कोना?
हमरा आऊर कें त'
कुरहरि-कोदारि पारैत
भाग'क रेखे मेटा
जाइ है तरहत्थी सं' -
बाजल रहय
ओ अधबयसू किसान
सन'क जउर घोरैत।
चोट्टहि बाजल
कोदारि'क बेंट में गुल्ली ठोकैत
नबजुआन छौंड़ा -
'एह बाबू,
जे हाथ कुरहरि-कोदारि पारत
से कि तरहत्थी'क रेखक' भरसबे
काटत जिनगी!
आ कि घाम चुआ,
बांहिक' जोरे,
बज्जरो चास के छाती चीरि
पारत अप्पन भाग'क रेख अपनहि!'
मोंछ'क पम्ह सं चुबैत
घाम पोंछि,
कोदारि कें कन्हेठि,
चलि देलक ओ बाध दिस
कोनो नबका सिनेमा के तान टेरैत

देखैत रहलै ओकर पिता

किछु छोह सं आ किछु नेह सं
जा धरि ओझल नहि भलैक नजरि सं बेटा।
- प्रणव कान्त झा
१८ अगस्त, २०१५.

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

आज...पंद्रह अगस्त है

आज
फिर पंद्रह अगस्त है।
तो आओ,
लालकिले की प्राचीर से
सात तोपों की सलामी ले
लच्छेदार भाषणों से
अतीत पर
छद्म गौरव जताएँ
शहीदों के नाम
घड़ियाली आँसू बहाएँ
भविष्य के
चमकीले सपने बेच कर
वर्तमान के
मन को बरगलाएं।
फिर
कल से
कुर्सी के पीछे टंगे
शहीदों की तस्वीरों की
नाक के नीचे
लोक की हत्या करेंगे
तंत्र का सट्टा करेंगे
जन को लूट-खसोट
अपनी कोठी भरेंगे
गण को तोड़ेंगे
पुश्तों को तारेंगे
उजले मनों पर
कालिख फ़ेरेंगे।
- प्रणव कान्त झा
१५ अगस्त, २०१५.