माँ,
अपनी मिट्टी से
दूर-देश
हमेशा
माथे पर अपने
आशीष भरे तुम्हारे-
चुंबन की महक
महसूस करता हूँ।
दुनियांदारी के
बोझ से लदा-थका
जब लौटता हूँ घर ,
मेज पर पड़ी
तेरी तस्वीर के साये-
स्नेहिल आंचल की हवा
महसूस करता हूँ।
रोज़ी-रोटी की
आपाधापी में,
आज भी
भटकने लगता हूँ
जब भी रास्ता;
बचपन की मानिंद ,
सबक़ देती, घूरती-
तुम्हारी नज़रों की तपिश
महसूस करता हूँ।
अब भी,
जब कभी चुभती हैं,
टूटे सपनों की किरचें-
सब्र देती हैं तुम्हारी सीख,
बचपन में जैसे,
कभी ठेस लगने पर ढाढ़स देते-
तुम्हारे नर्म हाथों के लम्स
महसूस करता हूँ।
लगता है,
आज भी जुड़ा हूँ
गर्भनाल से
और
स्पंदित है मेरा जीवन-
तुम्हारी ममता के स्पंदन से।
- प्रणव कान्त झा
09 मई, 2015