शनिवार, 9 मई 2015

माँ

माँ,
अपनी मिट्टी से 
दूर-देश 
हमेशा 
माथे पर अपने 
आशीष भरे तुम्हारे-
चुंबन की महक 
महसूस करता हूँ। 
दुनियांदारी के 
बोझ से लदा-थका 
जब लौटता हूँ घर ,
मेज पर पड़ी 
तेरी तस्वीर के साये-
स्नेहिल आंचल की हवा 
महसूस करता हूँ। 
रोज़ी-रोटी की 
आपाधापी में,
आज भी 
भटकने लगता हूँ 
जब भी रास्ता;
बचपन की मानिंद ,
सबक़ देती, घूरती-
तुम्हारी नज़रों की तपिश
महसूस करता हूँ। 
अब भी,
जब कभी चुभती हैं,
टूटे सपनों की किरचें-
सब्र देती हैं तुम्हारी सीख,
बचपन में जैसे,
कभी ठेस लगने पर ढाढ़स देते- 
तुम्हारे नर्म हाथों के लम्स 
महसूस करता हूँ। 
लगता है,
आज भी जुड़ा हूँ 
गर्भनाल से 
और 
स्पंदित है मेरा जीवन-
तुम्हारी ममता के स्पंदन से। 

- प्रणव कान्त झा 
09 मई, 2015   

शुक्रवार, 1 मई 2015

मज़दूर

इमारत की नींव
और 
मजदूरों में 
बड़ी समानता है,
कि 
जिस तरह जरूरी है 
बहुमंजिली इमारतों के लिए -
मज़बूत नींव,
वैसे ही जरूरी हैं 
बहुराष्ट्रीय धंधों के लिए -
मजबूर मज़दूर। 
वैसे, 
एक बड़ा फ़र्क़ भी है 
दोनों में,
कि 
जैसे बड़ी इमारत बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
नींव को मज़बूत करने में,
वैसे ही बड़ा धंधा बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
मजदूर को कमज़ोर करने में। 
शायद 
सबकी 
अपनी- अपनी 
ज़रूरत है 
और 
बाज़ार ज़रूरत ही से चलता है। 
पर 
जब भी 
मज़दूरों ने 
मजबूरी की सीमा लांघ ली,
बड़ी वातानुकूलित 
इमारतों के अंदर भी 
माथे पे पसीने आ जाते हैं,
क्योंकि,
बाज़ार तो 
'मांग और आपूर्ति' के नियम से  भी चलता है। 

- प्रणव कान्त झा 
01 मई, 2015.