सुख का अनुगामी होता दुःख,
दुःख के बाद आता है सुख।
फ़िर क्यों हारे मानव, शाश्वत
कोमल ह्रदय विपत्ति के सन्मुख?
मन भी है शिशु के समान,
ढूंढता आलंब शैशवपन में।
आशा-विश्वास सँभालते उसको,
देते हैं सहारा यौवन में।
जीवन आशाओं की है दीपावली,
कुछ दीप जले जीवन न मिटे।
खोजो, बंद चक्षुपट खोलो,
मिल जाएगा नवदीप सखे।
सोने में कहाँ प्रतीक्षा है,
सोये को कभी-कुछ मिला कहीं?
अपनी पलकें बस खुली रखो,
है सच्ची लगन निष्फल न कभी,
शायद मिल जाए कोई अपना,
इस जीवनपथ में तुम्हें कहीं।
प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2002.
दुःख के बाद आता है सुख।
फ़िर क्यों हारे मानव, शाश्वत
कोमल ह्रदय विपत्ति के सन्मुख?
मन भी है शिशु के समान,
ढूंढता आलंब शैशवपन में।
आशा-विश्वास सँभालते उसको,
देते हैं सहारा यौवन में।
जीवन आशाओं की है दीपावली,
कुछ दीप जले जीवन न मिटे।
खोजो, बंद चक्षुपट खोलो,
मिल जाएगा नवदीप सखे।
सोने में कहाँ प्रतीक्षा है,
सोये को कभी-कुछ मिला कहीं?
अपनी पलकें बस खुली रखो,
है सच्ची लगन निष्फल न कभी,
शायद मिल जाए कोई अपना,
इस जीवनपथ में तुम्हें कहीं।
प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2002.
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