पतझड़ के बाद है आता जब बसंत,
फूल हैं मिलते, हरसूं गंध फैलाते हुए.
पहले झुलसती धरा आग सी धूप में,
तब मेघ आते, जलधार बरसाते हुए.
पाषाण सहते हैं प्रथमतः चोट को,
सृजित होतीं आकृतियाँ तब मुस्काती हुई.
दर्द सहती हैं खिचन की तारें जब,
फ़िर निकलती तान मदमाती हुई.
जब है तपता कनक आग की आँच पर,
तब वो बनता, कुंदन ग़ज़ब ढाता हुआ,
जननी है सहती प्रसव की पीड़ जब,
फ़िर जनम लेता, बचपन मुस्काता हुआ.
यूँ देखते हम प्रकृति के हर खेल में,
दुख के पीछे, सुख है आता, मन हर्षाता हुआ.
- प्रणव कान्त झा
20 अप्रैल, 2000 (संपादित-06 जुलाई, 2013).
फूल हैं मिलते, हरसूं गंध फैलाते हुए.
पहले झुलसती धरा आग सी धूप में,
तब मेघ आते, जलधार बरसाते हुए.
पाषाण सहते हैं प्रथमतः चोट को,
सृजित होतीं आकृतियाँ तब मुस्काती हुई.
दर्द सहती हैं खिचन की तारें जब,
फ़िर निकलती तान मदमाती हुई.
जब है तपता कनक आग की आँच पर,
तब वो बनता, कुंदन ग़ज़ब ढाता हुआ,
जननी है सहती प्रसव की पीड़ जब,
फ़िर जनम लेता, बचपन मुस्काता हुआ.
यूँ देखते हम प्रकृति के हर खेल में,
दुख के पीछे, सुख है आता, मन हर्षाता हुआ.
- प्रणव कान्त झा
20 अप्रैल, 2000 (संपादित-06 जुलाई, 2013).
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