बुधवार, 29 जून 2016

मैथिली रचना - १७

जबावदेही
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कहिया तक करब
छुच्छ अतीत'क गुणगान
कहिया तक घोखब
पुरखे'क मान बखान?
मिथिला माने
अगबे
जनक-जानकी,
मंडन-भारती,
अयाची-विद्यापति सन
बड़का-बड़का 
ना' टा थोड़बेक छै!
मिथिला माने
बड़का-बड़का शहर'क
कि
सात समुद्दर पार विदेश'क
अकास छुबैत,
वातानुकूलित दफ़्तर में बैसल 
मोट कैंचा कमा,
बेस घर-जजाति अरजैत
कोनो भरिगर गोत्र-मूल'क
कुलदीपके सभ टा सेहो नहि।
मिथिला माने
हम-आहां,
ई-ओ,
खेत जोतैत कोनो रामखेलाओन,
दूध दूहैत कोनो किसुन,
बकरी-महींस चरबैत कोनो बिसुन,
आ कि
नोन-तेल-लकड़ी कें जोगाड़ में
दिल्ली-बंबई, असाम-पंजाब जाइत 
कोनो जीबछ, बौका कि बुझाओन सेहो।
मिथिला माने
आँगन-घर नीपैत कोनो सरोसत्ती,
गोबर-करसी करैत कोनो बुधनी,
चौर-चांचड़ में घाम चुआबैत कोनो रामेस्सरी,
भनसाघर में रान्ह करैत कोनो दिपुआ'क माय
संगहि
हक्कल डाईन-जोगिन होयबा'क दंश सहैत,
गाम-टोल सं बारल कोनो मसोमाति 
अल्लां पुर कि फल्लां पुर वाली बूढ़ी सेहो।
मिथिला माने
कोनो गोखुर टंगने
पंडी जी'क मुँह सं निकसैत
वेद, स्मृति, गायत्री/सावित्री, जनऊ, दूर्वाक्षत मंत्र
कि
कोनो त्रिपुंड ढौरने
जोतखी जी'क लाल मोसि सं खतियाओल
टिप्पैन, टिपौत कि लाल किताब'क
रेखे टा नहि छैक।
मिथिला माने
मुरेठ्ठा बन्हने
कोनो ह'र जोतैत हरबाह'क
ग'र सं निकसैत
अाल्हा, सलहेस, कुमर बृजभान'क टेर
संगहि
घाम बहबैत
कोनो ज'न-मजूर'क 
हर-कोदारि सं पारल,
खेत-चास'क सीना पर चमकैत
आरि-मेढ़ सेहो।
हे मीत!
राखू अखियास
जे 
कोनो जाति, समाज हो कि सभ्यता
ओकर अतीते टा नहि
वर्तमान आ भविष्य सेहो होइछ
संगहि
अतीत ख़ाली चमकैते
कि
वर्तमान-भविष्य अन्हारे सेहो कहाँ!
से
हम-आहां 
एतेक जे ई-ओ सभ,
आजु'क वर्तमान
काल्हु'क अतीतो त' होयब!
तखन त'
कने मोन पारू ने
जे 
की-की रचै-बसबै छी
हम-आहां-ओ 
आई
जाहि सं कि
सिद्ध होमय सभ'क जबावदेही
गौरब गान करय
हम्मर-आहां'क संतति?
औ संगी,
त' किएक ने
ल' हाथ में हाथ,
मिलाबी कान्ह सं कान्ह,
लगाबी बुद्धि आ बल
सभ संग मिलि
बनयबा लेल
एकटा नब पहिचान,
सभ्य आ सहृदय - मनुक्ख'क,
समय सं डेग मिलाबैत - समाज'क,
मानवता'क गुण सं बोरल - सभ्यता'क 
आ गढ़ी 
एकटा नव न्यायोचित इतिहास -
आबय बला पीढ़ी'क लेल।
जं से नहि त'
अपनहि कहने क़ाबिल सभ 
सं भरले अछि घरही -
सगरो मिथिला।

- प्रणव कान्त झा
३० जून, २०१६.



मंगलवार, 28 जून 2016

दिल की बातें - 32


दिल दरिया बन बैठा जबसे
प्यार बँटा फिर नहरों नहरों

शजर का टूटा पत्ता मैं ज्यों 
तिरता रहा हूँ लहरों लहरों

जो ख़ुशबू अंदर बसनी थी
ढूंढ़ा किया मैं शहरों शहरों 

नपे तुले अहसास ही बाँटो 
ग़ज़ल बंटे ज्यों बहरों बहरों

कहनी थी तो बात ज़रा सी
फिर भी कह पाए ना पहरों 

हैं सांसें बस चंद बचीं अब
तुम थोड़ी घड़ियाँ ही ठहरो

- प्रणव कान्त झा
२८ जून, २०१६.

 

शुक्रवार, 17 जून 2016

जीवन - एक दृष्टिकोण - 2

ये जीवन सुन्दर सरल नहीं 
इतनी भी बुरी है कहाँ सखे
सुख दुख हैं आते रहते ज्यों
मधुमोदक खा कड़वा चखें

पहले धरिणी जो तपे रवि से
तब नभ से शीतल बरसें बूँदें 
जब पोर पोर दुखता श्रम से
तो विश्राम को हम आँखें मूँदें

जब लड़ती शिलाओं से धारा
तो ही बनती वह धीर सरित
सह आतप बीज जो सड़े गले
तो करें धरा को शस्य हरित

परहित जो हलाहल पान करे
बनता शिव, विश्व उसे पूजे
निशि दिवस सर्पदंश जो सहे
दे वह सुगंध औ' शीश सजे

दाब ताप असीमित सह कर
हीरक तो विश्व श्रृंगार करे
जो सहे समय के आतप को
जग से उचित व्यवहार करे

उर जैसी अभिलाषाएँ पाले
वैसा ही प्रयास करें हम तो
कुछ भी नि:शुल्क नहीं यहाँ 
है मूल्य उचित देना हमको

है पौरुष संघर्षों में ही दिखता
सुख के समय सब कार्य सधे 
माना जीवन सुन्दर सरल नहीं 
पर इतनी भी बुरी है कहाँ सखे

- प्रणव कान्त झा
१८ जून, २०१६.

दिल की बातें - 31

दिल पर अब ज़ोर नहीं रहा उसका
अब तो वो उसका कहा नहीं करता

उनका दीदार जो ना होता इक बार
दिन कोई मुकम्मल फिर नहीं रहता

उसके ख़यालों में इस क़दर है गुम
याद उसे अब यह जहाँ नहीं रहता

अजीब ख़ुश्बुओं से दरपेश है वह 
होश और उसको कुछ नहीं रहता

जबसे उसने किया इज़हार ए वफ़ा 
वह किसी और से कुछ नहीं कहता

अब तो दरिया हुआ है उसका दिल
नैनों से अश्क़ का नहर नहीं बहता

दीवानगी इक अजीब शय है हज़रत 
जो ये हो तो इन्सान कुछ नहीं रहता

- प्रणव कान्त झा
१७ जून, २०१६.

गुरुवार, 9 जून 2016

दिल की बातें - 30

दिल पहलू में लिए फिरते यहाँ सब
सबकी बातों का यहाँ मत पास देना

लोग मतलब से क़रीब आते अक्सर
यों ही किसी को न अपना हाथ देना

बार-बार आएँगे क़रीब ज़माने के ग़म
थामे हँसी का दामन उनको मात देना

क़ुर्बां हुई हैं रातें मेरी आँसुओं के संग
देखना तुम इनको न अपनी रात देना

हम तो किए वादे निभाएँगे हद तक
तुम ख़ुद से ख़ुद का सदा साथ देना

- प्रणव कान्त झा
०९ जून, २०१६.


मंगलवार, 7 जून 2016

दिल की बातें - 29

इश्क़ रूहानी तुम्हें पता ही नहीं
मैं कहाँ इश्क़ ए फ़ानी चाहता हूँ 

फ़र्ज़ी अफ़साने बड़े फैले हैं यहाँ 
मैं कोई सच्ची कहानी चाहता हूँ 

बात कुछ तो हो तेरे-मेरे दरमियाँ 
कहां मैं कोई बदग़ुमानी चाहता हूँ 

सर्द से पड़ रहे जज़्बात हर तरफ़ 
अब रग़ ए ख़ूं में रवानी चाहता हूँ 

ज़रूरतें अपनी मैंने महदूद रक्खीं 
सफ़र में ज़रा आसानी चाहता हूँ

दिल की बातें ना इस शहर में करो
नहीं मसला कोई तूफ़ानी चाहता हूँ 

- प्रणव कान्त झा
०८ जून, २०१६. 


शनिवार, 4 जून 2016

निर्णय

मैं था निस्सीम, अथाह प्रिये
मुझको सीमित तुम्हीं ने किया

तुम लांछित मुझे भले कर लो
सारे ही दोष मुझ पर धर लो
नद सा था छलकता प्रेम मेरा
जिसको बाधित तुम्हीं ने किया

हर चोट सहा तुमसे जो मिला
जाने किस भाव से तुमने दिया
कोमल था हृदय मेरा शाश्वत
इसको पाषाण तुम्हीं ने किया

इक स्वप्नशील मैं जीव सखे
थे सारे स्वप्न, तुमसे ही जुड़े 
संग चलना था जिन राहों पे
उनको ध्वस्त तुम्हीं ने किया

था निर्णय बड़ा कठिन लेना
अस्तित्व दाँव पर था मेरा
समझौतों के सारे प्रयास
हर बार विफल तुम्हीं ने किया

जो हुआ वही है अटल अब तो
था यही प्रेम प्रारब्ध मेरा
सारा अतीत अब छोड़ चलूँ 
निर्णय को विवश तुम्हीं ने किया

जल बाँध तोड़ बह चुका भला
किस तरह बाँध पाओगी उसे
प्रत्यंचा से जो शर छूट चुका
उसका संधान तुम्हीं ने किया

हैं सब रस्ते जब बंद हो चुके
हा! रोओ भी तो क्या मिलना
मन को बाँधो, अब आगे बढ़ो
जब यह चुनाव तुम्हीं ने किया

मैं हूँ निस्सीम, अथाह प्रिये
मुझे यह सीमा तुम्हीं ने दिया।

- प्रणव कान्त झा
०४ जून, २०१६.




जीवन : प्रारब्ध

किसने है ईश्वर को देखा
विश्वास तथापि अटल होता।
क्यों ना खोजें हम उसको
जो सत्य की नाईं अचल होता।।

यह रूपराशि का बंधन जो
मेरे भी लिए अगर होता।
जीवन के विद्रूप देखना
प्रारब्ध कहो क्यों कर होता।।

यह रूप अभी है, कल ना हो
मन सुंदर हो तो अमर होता।
फिर रूप से मोह बताओ सखे 
किस तरह औ' क्यों कर होता।।

हो पथ जाना पहचाना जो
उत्साह पथिक का सबल होता।
अनजान राह यदि जाना हो
तो वीरों का उर ही प्रबल होता।।

माना जो प्रयास विफल हो तो
संत्रास, थकन प्रतिपल होता।
एकाग्र चित्त यदि लक्ष्य रहे
जीवन फिर सदा सफल होता।।

- प्रणव कान्त झा
०४ जून, २०१६.








शुक्रवार, 3 जून 2016

दिल की बातें - 28

तुम यों ना ख़ुदा तो बनाओ मुझको
कि फिर इंसां की तरह जी ना सकूँ

इतना तो ऊँचा ना बिठाओ मुझको
जो फिर ख़ुद को भी छू ही ना सकूँ 

जो थे ज़हीर, सब हुए हैं यों ज़ाहिर 
तू ख़ालिस है यक़ीं कर ही ना सकूँ 

यों उठ गया इश्क़ ए फ़ानी से यकीं
जो मिले अमरित तो ले भी ना सकूँ 

वक़्त से ग़मों की रफ़ूगरी मैं सीखता
ऐसे ना हवा दो कि उन्हें सी ना सकूँ 

हर घूँट ज़हर, बन गयी आदत मेरी
आबे ज़मज़म दो तो मैं पी ना सकूँ 

इक ज़ियादा तू भी ज़िद न कर अब
दो क़दम हो मौत मैं मर भी ना सकूँ 

- प्रणव कान्त झा
०३ जून, २०१६.


बुधवार, 1 जून 2016

दिल की बातें - 27

उसने कर रक्खा है क़ैद ख़ुद से ख़ुद को
उसका क़ातिल उसकी क़सम न हो जाए

लग तो जाऊँ गले दर्द से है यारी अपनी
मगर उसको फिर कोई भरम न हो जाए 

तिश्नगी हो रही तब्दील अश्क़ में उसकी
यूं ही इश्क़ का मुझको वहम न हो जाए

जख़्म सूखे भी नहीं जो हैं दिए माज़ी ने
दिल एक बार फिर नाफ़हम न हो जाए 

मिरा कातिब ए नसीब रहा मुझसे ख़फ़ा 
फिर नाक़द्र सफ़र का जनम न हो जाए

मुश्किलें सफ़र की कहाँ डराती मुझको
डर तो है कि सफ़र ही ख़तम न हो जाए

मिटे दर्द कि तोड़ दे वो क़फ़स की तीली
क्यों वह भी मेरा ही हमक़दम न हो जाए

- प्रणव कान्त झा
०१ जून, २०१६.