शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३३

पेस-पीस-स्पेस
************

आहां जं
अप्पन 'स्पेस'क खोजी में
ध्वस्त करैत छी
ककरो जिनगी'क 'पेस' आ 'पीस';
सहजें प्रमाणित होइत छी -
साहसी आ क्रांतिकारिणी।
मुदा जं
स्थिर रखबा लेल
अप्पन 'पेस' आ 'पीस'
हेरैत छी कखनहुं अप्पन 'स्पेस';
ह'म घोषित भ' जाइत छी -
अत्याचारी आ व्यभिचारी।
ओना
जौखन बनाबैत अछि
अहं अप्पन 'स्पेस' ककरो मोन में,
तखनहि लगैत अछि -
उखड़' अप्पन 'पेस' 
अखर' अनकर 'पीस' दुन्नू।
त'
कियैक नहि हम-आहां
एक-दोसरा'क हिया में बनबैत छी
अपन-अपन 'स्पेस',
जाहि सं कि
बनल रहय सबह'क जिनगी'क -
'पेस' आ 'पीस'।
कियैक त'
जा'धरि बनल रहत
ईर्खा आ स्वार्थ'क 'स्पेस' 
आओर
नहि खोजी क' सकब
अप्पन 'पीस', सबह'क 'पेस' में,
अहिना बनओने रहत अशांति;
अप्पन 'स्पेस' - जिनगी में।

- प्रणव नार्मदेय
३० दिसंबर, २०१६.

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

दिल की बातें - 42

दिल को लगी है ठेस, आँखें क्यों आबशार
तू है दिल्लगी का मारा तेरा कौन ग़मगुसार

दिल था दिया तुमने जिन्हें बड़े ही शौक़ से
ये आज़ाद तबीयत तेरी उनको थी नागवार

तुम्हारी नज़र में इश्क़ का आला मुक़ाम था
उनकी समझ में यह रहा है हुस्न का व्यापार 

यूं प्यार में ख़्वाहिश उन्हें थी इक ग़ुलाम की
जो क़ैद से निकला तो दिल हुआ है दाग़दार

है इक नया सफ़र तुम्हारा मुन्तज़िर ऐ दोस्त
और बीते सफ़र के मोड़ कुछ रहेंगे यादगार

- प्रणव नार्मदेय 
२८ दिसंबर, २०१६.

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३२

संबंध'क पुल
*************

की उचित छल
मेल आहां'क - हमरा संग?
उपेक्षा'क चोट सं घाहिल
हम्मर मोन जनैत छल
जे मोसकिल छल निमाह ककरो -
हमरा सन लोक सं।
तैं त'
सक भरि कयलहुं प्रयास हम;
बुझा सकी सभ संबंधित कें
जे बनल छलाह पुल -
हमरा-आहां'क बीच।
मुदा
कहाँ डोला सकलहुं 
एक्कहु टा खाम्ह ह'म
आ से अंतत:
हरदा बाजहि पड़ल हमरे।
संबंध आ संस्कार'क पगहा
छानिए लेलक पैर,
संगहि 
एकटा स्वार्थ आ मोन'क आस सेहो
जे किंसाइत बदलि जाय अहिना -
जिनगी'क रंग!
हमरा-आहां'क मध्य ई बन्हन
कतेक छल मजगूत
एकर बेस थाह त' छल अहीं कें;
कियैक त'
हम्मर सभ अनुमान छल
स्वार्थ'क सोंगर पर टाँगल -
एकटा स्नेहिल घ'र-परिवार'क सपना'क स्वार्थ।
सक भरि लगबैत रहलहुं,
समुच्चा ज़ोर -
नेह, निष्ठा आ आस'क संग
जे
बांचल रहय सभटा पुल,
अनामत - हमरा-आहां'क बीच।
मुदा 
शापित दांपत्य'क धार'क प्रवाह
रसे रसे काटि रहल छल -
हम्मर आत्मा'क कछार कें;
जैं कि
अहूं ध्वस्त करबा'क करैत रहलहुं प्रयास -
ओहि पुल'क गठबंधन कें।
कियैक नहि
बुझि सकलहुं आहां
जे 
बिनु मजगूत खाम्ह'क पुल कें
ह'म आ आहां भ' जायब
जिनगी'क धार कें दू गोट - असंपृक्त कछार।
से देखि लिय' जे
ह'म आ आहां
आबि गेलहुं अप्पन यथार्थ पर
आ साबित भेल जे
अनेर नहि छल हम्मर आशंका;
यैह छल नियति -
हम्मर-आहां'क संबंध'क।
तैं त'
आब हम्मर मोन'क कछार
नहि बनय द' रहल -
कोनो पुल;
अप्पन बाँचल अस्तित्व'क ख़ातिर!
आहां'क संसार में,
हम नहि बनि सकलहुं - आहां सन,
से नहि रहलहुं 
आहां'क संसार'क लायक;
पहिनहुं छलहुं - एकसर,
फेरि रहि गेलहुं - निठ्ठाह एकसर।
की बुझि सकब आहां,
जे अहि बेरि त'
आहां'क संबंध'क दाग
हम्मर नांगट जिनगी'क देह पर
भ' गेल अछि किछु तेना क' देखार;
ई कहाँ रहय देलक हमरा आब
हमरो दुनियाँ कें लायक?
स्तब्ध भेल अछि - हम्मर प्रेमी मोन;
अविश्वास'क शूल उठैत अछि - टूटल हिय सं नित्तह;
एकटा विश्वास'क आ एकटा स्वप्न'क -
ई गति देखैत!

- प्रणव नार्मदेय
२५ दिसंबर, २०१६.

मैथिली रचना - ३१

संक्रमित संबंध
***************

किछु संबंध भ' जाइछ -
जिनगी'क नहसूर;
जं गड़ि जाय मोन में 
अहं आकि अविश्वास'क खैंक
आ 
नहि निकालल जाय ओकरा
समय अछैत।
भ' जाइछ -
संवादहीनता'क पकोई;
भरि जाइत अछि -
अवसाद, ईर्खा, अविवेक आ घृणा'क पीज,
जं नहि हो इलाज एकर -
धैरज, विवेक आ सिनेह'क औखधि सं।
कैयक बेरि
अबडेरि देल जाइछ -
उचित संवाद'क मलहम-पट्टी कें
भ' जाइत अछि ई मारुक;
संक्रमित कर' लगैत अछि -
जिनगी'क देह कें।
अहि सं पहिने कि
होमय लागय आनों संबंध संक्रमित
आकि
मरय लागय जिनगी'क सभ सपना आ जिजीविषा 
अहि संक्रमण सं;
कोनो बेजाय नहि जे भ' जाइ बरु फराक -
ओहि संक्रमित संबंध सं।
जेना कि काटि देब' पड़ैछ -
असाध कैंसर सं संक्रमित अंग
ककरो देह सं;
जिउबा'क आस में।
आख़िर 
एकटा संबंध'क किम्मति पर
कोना मारल जा सकैछ -
जिनगी'क सभटा संबंध आ सपना!

- प्रणव नार्मदेय
२४ दिसंबर, २०१६.


मैथिली रचना - ३०

घाओ
******

जिनगी'क युद्ध में
कैयक बेरि 
घाहिल भ' जाइत अछि मनुक्ख।
से घाओ कोनो भ' सकैछ -
शरीर'क
आकि
मोन'क सेहो,
मुदा
शरीर'क घाओ सं बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!
शरीर'क घाओ कें त'
जीति आकि हारियो क'
जीबि लैत अछि मनुक्ख,
मुदा मोन'क घाओ'क धाह
जिउतो मनुक्ख कें दैछ हरा
आ 
जं हारल मोन से मुइले सन!
बेचियो क' ज़र-जजाति
लोक कीनि लैछ औखधि -
शरीर'क घाओ लेल,
जैं कि सहज भेंट जाइछ ई -
हाट-बजार।
मुदा
कहाँ अछि कोनो दोकान
बिकाइत हो जत' मलहम -
मोन'क घाओ लेल!
एकर मलहम त' थिक -
नेह आ सिनेह,
से ई कहाँ कीनि सकल कियो
बेगरता'क घड़ी; टाका-पैसा सं,
खाह ओ होमय कतबो धन्ना सेठ।
शरीर'क घाओ सं व्यथित 
लोक'क कष्ट होइछ - नितांत व्यक्तिगत;
मुदा
मोन'क घाओ ल' जीबैत मनुक्ख 
क' सकैछ सर-समाज कें - घबाह
आकि
मनुक्खता कें सेहो - घाहिल,
कैयक बेरि।
कहलहुं ने,
शरीर'क घाओ सं
बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!

- प्रणव नार्मदेय
२२ दिसंबर, २०१६.

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २९

एकटा प्रश्न
************

औ जी,
एकटा प्रश्न पूछू?
पुछबा सं पहिने पूछि लेलहुं;
कारण,
जे आइ-काल्हि
प्रश्न पूछ' पर सेहो
उठि रहल अछि प्रश्न!
जं तैयो
पुछिए लेल आहां,
त' रहब तैयार
जे उत्तर में दागल जा सकैछ - प्रतिप्रश्न।
ओना,
की कहैत छी?
जं पूछल नहि जाय
तं
प्रश्न की रहत नहि?
ई प्रश्न त'
प्रश्न बनि ठाढ़ रहबे करत!
से 
जं मुँह नहि त' आँखि पूछत,
जं शब्द नहि त' भाव पूछत,
आ जं लोक नहि,
तखन आत्मा त' पुछबे ने करत प्रश्न?
तैं त' मोन कहलक,
पुछिए ली अहीं सं जे
की बिनु प्रश्ने -
आहां पहुंचल जतय,
से होइत कहियो संभव?
नहि ने!
त' फेरि आइ कियैक भ' गेल अछि,
प्रश्न पूछब - अक्षम्य अपराध?

- प्रणव नार्मदेय
१४ दिसंबर, २०१६.

रविवार, 4 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २८

मोन'क कोन सं
***********

कोनो माई'क रूपा-सोना तों पौती के
कत्तहु बाप'क आँखि'क तारा तों बौआ

कियो हंसि हंसि तोरा तरहत्थी राखल
ककरो बहैत नोर'क बसुधारा तों बौआ

कियो लक्ष्मी कहि धन्न भाग क' पाबैए
ककरो घ'र कें गोबर'क टारा तों बौआ

कियो त' ग'र कें फंदा तोरा बूझि रहल
ककरो ग'र में सोन'क छाड़ा तों बौआ

कियो माथा कें बोझ सदति तोरा क'हय
ककरो जिनगी'क एक सहारा तों बौआ

कियो आंगन'क तुलसी बुझि पूजय तोरा
ककरो घर कें टूटल लतमारा तों बौआ

कियो त' तोरे हिया कें फूल बना राखय
ककरो लेल लोभ'क बंटखारा तों बौआ

कत्तहु चान'क धरती पर तों राज करह
कत्तहु बंदिनी आँगन'क कारा तो बौआ

जं सिया बनि कत्तहु धैरज धयल करह
फेरि दुर्गो बनि क' दैह उतारा तों बौआ

जिनगी में बिनु तोरे रहल कहाँ किछुओ
हमर अकास'क चान-सितारा तों बौआ

- प्रणव नार्मदेय 
०५ दिसम्बर, २०१६.

मैथिली रचना - २७

ओहिना... किछुओ....

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

प्रीत भरल जिनगी केर सपना
सदिखन हम्मर मन देखल जे
लागय साँचे सपना चमकैत
प्रेम अकास में चान उगल जे
जा'धरि छुबितहुं चान उचकि क'
मृगतृष्णा छल, ओ कहि गेल

हारल मन आ संग आहां केर
बिधि-बिधना'क मिलायल छल जे
अहि गिरहस्ती के बगिया में
सुन्नर फूल फुलायल छल जे
उपवन गमकाबय सं पहिने
कांट'क बीच कोना रहि गेल

अहं आंहां कें कत' पिड़ायल 
कोन कमी भेल नहि बूझल से
साँच हिया हम रीत निमाहल
कियैक आहां कें नहि सूझल से
हम्मर जिनगी'क बाट सरल छल
तैयो कियैक चलल नहि गेल

हम्मर मन में चमकैत सपना
घुप्प अन्हरिया आंहां भरल जे
प्रेमामृत सं फूल गमकितय
तेकरा जारल'क ईर्खा गरल जे
भ'ल पिचायत दू पाट'क बीच
फकरा ई कबिरा कहि गेल

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

- प्रणव नार्मदेय 
०४ दिसंबर, २०१६.

दिल की बातें - 41

कहां रोया कभी, लो अब रो लिया मैंने 
वक़्त का है सितम, सब खो दिया मैंने 
 
तूफ़ां में टूटते, ऊँचे ही दरख़्तों के शजर
ना जाने क्यों, बड़ा ख़्वाब बो दिया मैंने 

इक झोंके से, फूंकेगी आशियाना ये मेरा
जान कर भी इस शमां को लौ दिया मैंने 

बहुत मशहूर रही, बेफ़िक्री ज़माने में मेरी
इक उसके आते ही, सुकून खो दिया मैंने 

मेरे जज़्बात, वफ़ा, इश्क़, भरम और यक़ीं 
उसने कुछ भी न रखा उसको जो दिया मैंने

ख़ुदपसंदी, ख़ुदसरी, ख़ुदगर्ज़ अना, आज़ादी 
जिसकी ख़्वाहिश थी उसे वही लो दिया मैंने

तमामतर रिश्ते जिसे बोझ की तरह से लगे
उसको रिश्तों से यूं आज़ादी ही तो दिया मैंने 

- प्रणव नार्मदेय 
४ दिसम्बर, २०१६.


गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २६

ओहिना.... किछुओ....

एकटा चन्ना कहियो हमरो
मोन'क आँगन आयल छल
राति अन्हरिया जे देखल त'
हमरो आँखि नोरायल छल

हंसि क' ताकय जखने चन्ना
सगरो छिटकैत छल चानी
हमरा मोन'क कोन-कोन में 
वैह इंजोर समायल छल

कानब खनहि, खनहि में ठठ्ठा
रूसब, बौंसब, हंसि बाजब
हम्मर जिनगी'क सभटा रंग में 
ओकरे रंग घोरायल छल

गाबय गीत प्रीत कें संग-संग
पातर ठोर आ बोल मधुर
हमरे संग जिनगी जीबय लेल
नैन ओकर सपनायल छल

मोन'क तप्पत मरुथल में ओ
शीत'क शीतल बुन्न बनल
जिनगी'क सगरो रौदी-दाही
ओकरा संग हेरायल छल

काल'क देल घाह पर लागय
ओक्कर नेह'क लेप मधुर
हम्मर हिय कें अकाबोन बीच
ओ अड़हुल फुलायल छल

जानि ने कोन नज़रि लागल जे
सुख सभटा सपने रहि गेल
कोन ग्रहण चन्ना कें चोराओल
केहन अमावस आयल छल

एकटा चन्ना कहियो हमरो
मोन'क आँगन आयल छल
राति अन्हरिया जे देखल त'
हमरो आँखि नोरायल छल

- प्रणव नार्मदेय 
०२ दिसंबर, २०१६.