अनमोल कृति - 1
हम मेहनतकश जगवालों से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनियां मांगेंगे.
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे.
वो सेठ, व्यापारी, रजवाड़े, दस लाख तो हम हैं दस करोड़,
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे.
जो खून बहे, जो बाग़ उजड़े, जो गीत दिलों में क़त्ल हुए,
हर कतरे का, हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे.
जब सब सीधा हो जायेगा, जब सब झगड़े मिट जायेंगे,
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बाँट बराबर खायेंगे.
हम मेहनतकश जगवालों से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनियां मांगेंगे.
साभारः फैज़ अहमद 'फैज़'
अनमोल कृति - 2
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को ।
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को ।
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को ।
पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफ़रत के रेगिस्तान को ।
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति - 3
साभार: जनाब कैफ़ी आज़मी
अनमोल कृति -8
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें
लोकरंजन हो जहां शम्बूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें
कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें
बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें
साभार: श्री अदम गोंडवी
अनमोल कृति -9
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि यह बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
साभार: कवि दुष्यंत कुमार
अनमोल कृति -10
सदाकत पर जो है वो रहबरी तस्लीम करता हूँ |
जो सच्चा रहनुमा है उसकी मैं ताजीम करता हूँ |
तास्सुब को बढ़ावा देने बाले रहबरों बोलो |
जमीरो जर्फ़ के सौदागरों अपनी जुबाँ खोलो |
तुम्हारा फर्ज क्या है और ये क्या कर रहे हों तुम |
जवानाने वतन के दिल में नफरत भर रहे हो तुम |
तुमें हिन्दू से हमदर्दी न मतलब है मुसलमां से |
वफ़ा का दर्द गीता से लिया तुमने न कुरआँ से |
मगर मज़हब का नाम आ जाये तो नारे लगाते हो |
यहाँ दैरो हरम के नाम पर झगडे कराते हो |
चलाया जंगली क़ानून इंसानों की बस्ती में |
गिरे हैं मंदिरो मस्जिद तुम्हारी सर परस्ती में |
मै शायर हूँ जो देखूंगा बही हर बार लिक्खूँगा |
तुम्हे गद्दार लिक्खा है तुम्हे गद्दार लिक्खूँगा ||
साभार: जनाब ज़ोहर कानपुरी
अनमोल कृति -11
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिंदोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये वंदे-मातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठ कर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
सदन में घूस दे कर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -12
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई
रमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में
खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में
जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में
ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -13
हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -14
खून रुलावाएगी ये जंगल परस्ती एक दिन
सब चले जायेंगे खाली करके बस्ती एक दिन
चूसता रहता है रस भौंरा अभी तक देख लो
फूल ने भूले से की थी सरपरस्ती एक दिन
देने वाले ने तबीयत क्या अज़ब दी है उसे
एक दिन ख़ानाबदोशी घर गिरस्ती एक दिन
कैसे-कैसे लोग दस्तारों के मालिक हो गए
बिक रही थी शहर में थोड़ी सी सस्ती एक दिन
तुमको ऐ वीरानियों शायद नहीं मालूम है
हम बनाएँगे इसी सहरा को बस्ती एक दिन
रोज़ो-शब हमको भी समझाती है मिट्टी क़ब्र की
ख़ाक में मिल जायेगी तेरी भी हस्ती एक दिन
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
अनमोल कृति -15
मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे ।
हम अपने इस कालखण्ड का एक नया इतिहास लिखेंगे ।
सदियों से जो रहे उपेक्षित श्रीमन्तों के हरम[1] सजाकर,
उन दलितों की करुण कहानी मुद्रा[2] से रैदास लिखेंगे ।
प्रेमचन्द की रचनाओं को एक सिरे से खारिज़ करके,
ये 'ओशो' के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष लिखेंगे ।
एक अलग ही छवि बनती है परम्परा भंजक होने से,
तुलसी इनके लिए विधर्मी, देरिदा[3] को ख़ास लिखेंगे ।
इनके कुत्सित सम्बन्धों से पाठक का क्या लेना-देना,
लेकिन ये तो अड़े हैं ज़िद पे अपना भोग-विलास लिखेंगे ।
शब्दार्थ:
↑ अन्तःपुर, जनानख़ाना
↑ हिन्दी के लेखक मुद्राराक्षस
↑ विखण्डनवाद का सिद्धान्त देने वाले पाश्चात्य विद्वान जॉक देरिदा
साभार: जनाब अदम गोंडवी
हम मेहनतकश जगवालों से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनियां मांगेंगे.
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे.
वो सेठ, व्यापारी, रजवाड़े, दस लाख तो हम हैं दस करोड़,
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे.
जो खून बहे, जो बाग़ उजड़े, जो गीत दिलों में क़त्ल हुए,
हर कतरे का, हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे.
जब सब सीधा हो जायेगा, जब सब झगड़े मिट जायेंगे,
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बाँट बराबर खायेंगे.
हम मेहनतकश जगवालों से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनियां मांगेंगे.
साभारः फैज़ अहमद 'फैज़'
अनमोल कृति - 2
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को ।
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को ।
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को ।
पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफ़रत के रेगिस्तान को ।
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति - 3
नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मुलाक़ातों पे हँसते, बोलते हैं, मुस्कराते हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
खुले रखते हैं दरवाज़े दिलों के रात-दिन दोनों
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
उसे हालात ने रोका मुझे मेरे मसायल ने
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
अनमोल कृति - 4
घरौंदे तोड़ कर साहिल से यूँ पानी पलटता है
कि जैसे मुफ़लिसी से खेल कर ज़ानी पलटता है
किसी को देखकर रोते हुए हँसना नहीं अच्छा
ये वो आँसू हैं जिनसे तख़्त-ए-सुलतानी पलटता है
कहीं हम सरफ़रोशों को सलाख़ें रोक सकती हैं
कहो ज़िल्ले इलाही से कि ज़िन्दानी पलटता है
सिपाही मोर्चे से उम्र भर पीछे नहीं हटता
सियासतदाँ ज़बाँ दे कर बआसानी पलटता है
तुम्हारा ग़म लहू का एक-एक क़तरा निचोड़ेगा
हमेशा सूद लेकर ही ये अफ़ग़ानी पलटता है
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मुलाक़ातों पे हँसते, बोलते हैं, मुस्कराते हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
खुले रखते हैं दरवाज़े दिलों के रात-दिन दोनों
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
उसे हालात ने रोका मुझे मेरे मसायल ने
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं.
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
अनमोल कृति - 4
घरौंदे तोड़ कर साहिल से यूँ पानी पलटता है
कि जैसे मुफ़लिसी से खेल कर ज़ानी पलटता है
किसी को देखकर रोते हुए हँसना नहीं अच्छा
ये वो आँसू हैं जिनसे तख़्त-ए-सुलतानी पलटता है
कहीं हम सरफ़रोशों को सलाख़ें रोक सकती हैं
कहो ज़िल्ले इलाही से कि ज़िन्दानी पलटता है
सिपाही मोर्चे से उम्र भर पीछे नहीं हटता
सियासतदाँ ज़बाँ दे कर बआसानी पलटता है
तुम्हारा ग़म लहू का एक-एक क़तरा निचोड़ेगा
हमेशा सूद लेकर ही ये अफ़ग़ानी पलटता है
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
अनमोल कृति -5
साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं
इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं
देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं
इस की भी मजबूरियाँ हैं, मेरी भी मजबूरियाँ हैं
रोज मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
आदमी क्या है गुजरते वक्त की तसवीर है
जाने वाले को सदा देकर बुला सकते नहीं
किस ने किस का नाम ईंट पे लिखा है खून से
इश्तिहारों से ये दीवारें छुपा सकते नहीं
उस की यादों से महकने लगता है सारा बदन
प्यार की खुशबू को सीने में छुपा सकते नहीं
राज जब सीने से बाहर हो गया अपना कहाँ
रेत पे बिखरे हुए आँसू उठा सकते नहीं !!
साभार: जनाब बशीर बद्र
अनमोल कृति -6
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।
जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।
लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
साभार: कवि दुष्यंत कुमार
साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं
इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं
देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं
इस की भी मजबूरियाँ हैं, मेरी भी मजबूरियाँ हैं
रोज मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
आदमी क्या है गुजरते वक्त की तसवीर है
जाने वाले को सदा देकर बुला सकते नहीं
किस ने किस का नाम ईंट पे लिखा है खून से
इश्तिहारों से ये दीवारें छुपा सकते नहीं
उस की यादों से महकने लगता है सारा बदन
प्यार की खुशबू को सीने में छुपा सकते नहीं
राज जब सीने से बाहर हो गया अपना कहाँ
रेत पे बिखरे हुए आँसू उठा सकते नहीं !!
साभार: जनाब बशीर बद्र
अनमोल कृति -6
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।
जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।
लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
साभार: कवि दुष्यंत कुमार
अनमोल कृति -7
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
ये जमीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाखों से उतारे हम ने ।
इन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओ मे गुजारे हम ने ।
हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हम ने ।
कि ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद,
बाम-ओ-दर और जरा, और सँवारा हम ने ।
आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शामों की लौ
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने ।
बन गया कसर तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये ।
अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पयाम की थकान
बंद आंखों में इसी कसर की तसवीर लिये ।
दिन पिघलता है इसी तरह सारों पर अब तक
रात आंखों में खटकतीं है स्याह तीर लिये ।
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
ये जमीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाखों से उतारे हम ने ।
इन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओ मे गुजारे हम ने ।
हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हम ने ।
कि ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद,
बाम-ओ-दर और जरा, और सँवारा हम ने ।
आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शामों की लौ
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने ।
बन गया कसर तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये ।
अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पयाम की थकान
बंद आंखों में इसी कसर की तसवीर लिये ।
दिन पिघलता है इसी तरह सारों पर अब तक
रात आंखों में खटकतीं है स्याह तीर लिये ।
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
साभार: जनाब कैफ़ी आज़मी
अनमोल कृति -8
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें
लोकरंजन हो जहां शम्बूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें
कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें
बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें
साभार: श्री अदम गोंडवी
अनमोल कृति -9
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि यह बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
साभार: कवि दुष्यंत कुमार
अनमोल कृति -10
सदाकत पर जो है वो रहबरी तस्लीम करता हूँ |
जो सच्चा रहनुमा है उसकी मैं ताजीम करता हूँ |
तास्सुब को बढ़ावा देने बाले रहबरों बोलो |
जमीरो जर्फ़ के सौदागरों अपनी जुबाँ खोलो |
तुम्हारा फर्ज क्या है और ये क्या कर रहे हों तुम |
जवानाने वतन के दिल में नफरत भर रहे हो तुम |
तुमें हिन्दू से हमदर्दी न मतलब है मुसलमां से |
वफ़ा का दर्द गीता से लिया तुमने न कुरआँ से |
मगर मज़हब का नाम आ जाये तो नारे लगाते हो |
यहाँ दैरो हरम के नाम पर झगडे कराते हो |
चलाया जंगली क़ानून इंसानों की बस्ती में |
गिरे हैं मंदिरो मस्जिद तुम्हारी सर परस्ती में |
मै शायर हूँ जो देखूंगा बही हर बार लिक्खूँगा |
तुम्हे गद्दार लिक्खा है तुम्हे गद्दार लिक्खूँगा ||
साभार: जनाब ज़ोहर कानपुरी
अनमोल कृति -11
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिंदोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये वंदे-मातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठ कर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
सदन में घूस दे कर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -12
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई
रमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में
खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में
जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में
ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -13
हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए
छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए
साभार: जनाब अदम गोंडवी
अनमोल कृति -14
खून रुलावाएगी ये जंगल परस्ती एक दिन
सब चले जायेंगे खाली करके बस्ती एक दिन
चूसता रहता है रस भौंरा अभी तक देख लो
फूल ने भूले से की थी सरपरस्ती एक दिन
देने वाले ने तबीयत क्या अज़ब दी है उसे
एक दिन ख़ानाबदोशी घर गिरस्ती एक दिन
कैसे-कैसे लोग दस्तारों के मालिक हो गए
बिक रही थी शहर में थोड़ी सी सस्ती एक दिन
तुमको ऐ वीरानियों शायद नहीं मालूम है
हम बनाएँगे इसी सहरा को बस्ती एक दिन
रोज़ो-शब हमको भी समझाती है मिट्टी क़ब्र की
ख़ाक में मिल जायेगी तेरी भी हस्ती एक दिन
साभार: जनाब मुनव्वर राणा
अनमोल कृति -15
मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे ।
हम अपने इस कालखण्ड का एक नया इतिहास लिखेंगे ।
सदियों से जो रहे उपेक्षित श्रीमन्तों के हरम[1] सजाकर,
उन दलितों की करुण कहानी मुद्रा[2] से रैदास लिखेंगे ।
प्रेमचन्द की रचनाओं को एक सिरे से खारिज़ करके,
ये 'ओशो' के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष लिखेंगे ।
एक अलग ही छवि बनती है परम्परा भंजक होने से,
तुलसी इनके लिए विधर्मी, देरिदा[3] को ख़ास लिखेंगे ।
इनके कुत्सित सम्बन्धों से पाठक का क्या लेना-देना,
लेकिन ये तो अड़े हैं ज़िद पे अपना भोग-विलास लिखेंगे ।
शब्दार्थ:
↑ अन्तःपुर, जनानख़ाना
↑ हिन्दी के लेखक मुद्राराक्षस
↑ विखण्डनवाद का सिद्धान्त देने वाले पाश्चात्य विद्वान जॉक देरिदा
साभार: जनाब अदम गोंडवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें