माँ,
आज भी तुम्हें है-
मेरी हर जरूरत का ख़याल
अपनी
हर जरुरत से ज़्यादा।
माँ,
आज भी पहले की तरह-
सहती हो मेरे हिस्से का
हर दर्द बेदर्द बन कर;
मुझे दर्द से बचाने के लिए।
माँ,
आज भी मेरी रक्षार्थ-
झोंक देती हो ख़ुद को
काल की भट्ठी में,
स्वयं को अरक्षित कर भी।
माँ,
लोग कहते हैं-
उऋण हो जाऊँगा मैं
तुम्हें मुखाग्नि देकर,
तुम्हारे हर क़र्ज़ से।
क्या
सच में तुम
ऋण मुक्त कर दोगी मुझे
इस तरह?
माँ,
मैं तुम्हारा ऋणी
रहना चाहता हूँ;
अगले सात जन्मों तक;
तुम्हारा ही बच्चा
होना चाहता हूँ ......माँ।
प्रणव कान्त झा
12 मई, 2013.
आज भी तुम्हें है-
मेरी हर जरूरत का ख़याल
अपनी
हर जरुरत से ज़्यादा।
माँ,
आज भी पहले की तरह-
सहती हो मेरे हिस्से का
हर दर्द बेदर्द बन कर;
मुझे दर्द से बचाने के लिए।
माँ,
आज भी मेरी रक्षार्थ-
झोंक देती हो ख़ुद को
काल की भट्ठी में,
स्वयं को अरक्षित कर भी।
माँ,
लोग कहते हैं-
उऋण हो जाऊँगा मैं
तुम्हें मुखाग्नि देकर,
तुम्हारे हर क़र्ज़ से।
क्या
सच में तुम
ऋण मुक्त कर दोगी मुझे
इस तरह?
माँ,
मैं तुम्हारा ऋणी
रहना चाहता हूँ;
अगले सात जन्मों तक;
तुम्हारा ही बच्चा
होना चाहता हूँ ......माँ।
प्रणव कान्त झा
12 मई, 2013.
Missing U alot Bhaiji😭
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