शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

धरती हूँ मैं

तुम सोचते हो,
तुम हो सर्वशक्तिमान!
तभी तो,
कभी तुम नोंचते हो
मेरी हरितिमा को,
कभी क्षत-विक्षत करते हो मुझे
डायनामाइट से,
स्वार्थ हेतु
तुम सदैव नष्ट करने पर तुले हो
मेरी सुंदरता,
मेरी रचनाओं को (जंगल, जल,ज़मीन);
जो अंततः होम होते हैं -
तुम्हारे सुखार्थ।
धरती हूँ मैं,
धारण किया है मैंने तुम्हें -
तुम्हारी हर धृष्टता के बावज़ूद,
सह रही तुम्हारा गर्व,
उद्दंडता, लालच और उच्छिष्ट;
हरपल;
माँ की तरह।
भूल गए हो तुम
कि
मैंने ही बख़्शी हैं तुम्हें शक्तियाँ
कि जिनकी बदौलत हैं -
तुम्हारी सफलताएँ,
वरना
हो तुम अशक्त और निरीह;
जन्मजात।
देखो, सोचो, संभलो ज़रा,
माना मैं हूँ सहनशील
पर
अपनी सीमाएँ पहचानो तुम
ताकि
मुझे अपनी सीमा तो
ना भूलनी पड़े कभी।
तुम भूलो मत
कि
अपनी सारी सामर्थ्य और शक्तियों के बावज़ूद
लाचार रह जाओगे
तुम
जब भी क्रोधित करोगे मुझे,
आख़िर,
जिसमें शक्ति हो सृजन की
उसी से संभव है
विनाश भी।
फ़िर,
यह
तुमसे बेहतर
कौन जानता है
और
मुझसे बेहतर
कौन सिद्ध करेगा?

- प्रणव कान्त झा
18 अप्रैल, 2014.


रविवार, 9 मार्च 2014

स्त्री दिवस विशेष - मैं भयभीत हूँ

हे नारी,
आज जब
हर जगह तुम्हारी
स्तुतियाँ
गायीं जा रही होंगी
और
पुरुषसत्तात्मक समाज के बंधनों
से नारी मुक्ति के
संकल्प लिए जा रहे होंगे,
मैं
अपने अनजान
एकांत में बैठा
भयभीत हूँ तुमसे।
मेरे
भय को
अन्यथा मत लेना तुम
किसी मनुवादी की सोच
की तरह।
मैं
बिलकुल नहीं
चाहता कि
तुम निरीह रहो
सीता, अहिल्या और तारा की तरह
सतीत्व के उदाहरणार्थ।
अथवा,
छली जाओ तुम
मंदोदरी, गांधारी और दमयंती के जैसी
पतिव्रत के
प्रतिमान गढ़ने हेतु।
मैं तो
यह भी नहीं चाहता
कि
तुम भोग्या बनो
रम्भा, मेनका और उर्वशी की तरह
देवों के सुखार्थ।
अथवा,
अपहृता होओ
अम्बा, अंबिका और अंबालिका के जैसी
किसी दम्भी के
पुरुषार्थ प्रमाण हेतु।
मैं
ज़रा भी
भयभीत नहीं 
कि
पुरुषों के निर्धारित
सारी सीमाओं को तोड़
पुनः
प्रतिष्ठित हो रही तुम
घोषा, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी
और
भारती की तरह।
ना,
मुझे तनिक भी भय नहीं
कि
आज फिर तुम
स्वयंवरा हो रही हो,
अपने शिव और सत्यवानों की
सती और सावित्री की तरह
या कि
हरण कर रही हो,
अपने कृष्ण और अर्जुनों का
रुक्मिणी और सुभद्रा की तरह
वा कि
उपभोग कर रही हो,
अपने इच्छित प्रियों का
कुंती, माद्री और द्रौपदी की तरह।
मैं
भयभीत हूँ
कि
पुरुषों से होड़ करती तुम भी
उन्हीं के जैसी
अहंकारी, अराजक और अमानवीय
हो गयीं
तो
अंतर क्या होगा
तुम्हारे और उनके बीच?
मैं
भयभीत हूँ
कि
आख़िर,
ताड़का, पूतना हो कि सूर्पनखा,
थीं तो वह भी स्त्रियाँ ही।

- प्रणव कान्त झा
08 मार्च, 2014.

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

दिल की बातें - 5

पाँव बुज़ुर्गों के छुए जब भी हमने तो मिली,
मुसलसल दुआ उनकी कि लम्बी हो उमर। 

मिलती रही दुआएँ और हम जीते ही गए,
सोचा कहाँ कभी कि क्यों लम्बी हो उमर?

क़िरदार बड़ा, सोच बड़ी, हो कुछ तदबीर भी,
इसमें  क्या बड़ाई कि बस लम्बी हो उमर।

बेख़ुदी में रहे हम ताउम्र ख़ुदग़र्ज़ी में जिए,
जो दिल ही नहीं बड़ा, क्यों लम्बी हो उमर?

जीना कुछ इस तरह, बाद-ए-ज़िंद भी जियो,
छोटी भी गुज़ारो कि ख्वाह लम्बी हो उमर। 

- प्रणव कान्त झा 
26 जनवरी, 2014. 
   

  

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

दिल की बातें - 4

जिस रह चला हूँ, जो सफ़र चुना है मैंने,
दुश्वारियाँ तो हैं , फिर भी एक सपना है।

कोई मंज़िल नहीं आसां, मेरी भी होगी कैसे,
ख्वाब मुश्किल सही, हक़ीक़त में इन्हें ढलना है।

वक़्त की राख़ ने छुपा रक्खे हैं इम्तिहां के शोले,
हर सिम्त चराग़ाँ हो, अभी और मुझे जलना है।

चंद अपने भी हैं राह में, तेग़-ओ-ख़ंजर लेकर,
जख्मी रूह लिए, सब्र-ओ-ज़ब्त से पर चलना है।

ये मिट्टी, ये हवा-पानी, सब दुश्मन हैं तो क्या,
पौध-ए-ख्वाहिशात को हर हाल में पनपना है।

पुकारता हूँ तुम्हें, दर्द-ए-दिल की गलियों से आओ,
वसीला-ए-मंज़िल की तेज़ धूप में जो तपना है।

जिस रह चला हूँ, जो सफ़र चुना है दिल ने,
दुश्वारियाँ तो हैं, फिर भी एक सपना है।

- प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2014. 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

दिल की बातें - 3 …. नव वर्ष की शुभेच्छाओं के संग

मेरे सभी अपनों को, शुभेच्छुओं को, साथ ही उनको भी जिनको कि मेरा दर्द भी ख़ुशी देता हो, ये नया साल 2014 मुबारक़ हो. प्रकृति आपको आपकी ज़िन्दगी के इस साल की किताब के 365 सफ़्हों में से हर सफ़्हे पर आपकी कामयाबी की नई इबारत लिखने का मौक़ा दे. आपके कामयाबी की हर कहानी आपके अपनों की ख़ुशी और उनके होठों की हँसी का वायस हो. मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ हरचंद आपके साथ हैं.
आपका, प्रणव।

दर्द बेशुमार दिए हमको गुज़रे हुए वक़्त ने माना
ख़ुशी हरचंद नहीं मिलती, ये भी है इक सवाल चलें।

चंद मग़रूर जो नासूर बन गए थे रिश्ता-ए-दिल के
छोड़ उनको ग़ुरूर पे उनके, अज़ीज़-ए-दिल करें निहाल चलें।

भूल जो भी हुई है अब तक इरादतन-ग़ैरइरादतन चाहे
भूल को भूलकर करते हैं, नया कुछ इस साल चलें।

सपनों पर जो पड़ गया था गर्द-ए-वक़्त अब तक शायद
पोंछ कर हर लम्हात को हम, कायम करें मिसाल चलें।

राह में रुक गए थे ठिठक कर जो कल तक पल-छिन
शुरू करते हैं नया इक सफ़र, चलो अबके साल चलें।

ग़ैर-ज़रूरी जो भी हों उन बातों को ज़रा टाल के परे
छोड़ो पुरानी चाल कि अब आया है नया साल चलें।

- प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2014.