शनिवार, 20 जुलाई 2013

मेरा दृष्टिकोण - २

हर वर्ष हमारे देश के हिन्दू मतावलंबी देवोत्थान एकादशी का व्रत रखते हैं, विशेषतः मैथिल ब्राह्मण। जब एक संस्कृति सदियों से अपने अंदर हजारों कुप्रथाओं को जन्म देकर उन्हें महिमामंडित करती हो और उन कुप्रथाओं के अमानवीय कुप्रभावों की तरफ से सहजता से आँख मूँदे पड़ी हो, जब मनुष्य के अंदर बैठा देव अनंत शैय्या से उठने को तैयार नहीं हो रहा हो, उसे अपने मिथ्यास्वप्नों और स्वार्थनिद्रा में आनंद अनुभूति मिल रही हो तो प्रतीकात्मक देवोत्थान सदियों तक करते रहने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। सिर्फ संस्कृतियों के नाम पर ऐसी निरर्थक रिवाजों को ढोते रहने से अच्छा है इन्हें समाप्त कर कुछ सार्थक संस्कृतियाँ और प्रथाएँ बनाई जाएँ। क्षमा चाहुंगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हों तो। वैसे आज कल अपने देश में भावनाएं आहत होने की प्रथा बड़े ज़ोरों पर है।वैसे ऐसे धार्मिक (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले हों) लोगों की भावनाएं भी कमाल की होती हैं - जब दूसरों की आहत हों तो आनंद पर अपनी आहत हों तो पीड़ा।

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