हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
था सदियों से अपना भारत
ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ा.
'यह सूरज होता अस्त नहीं'
शासक था ख़ुद पर यूँ अकड़ा.
तुमने जब बड़ी वह तोड़ी
सोचा दुःख के बादल तो छटे.
एक आह सुनी, देखा हमने,
थे माँ के कोमल हाथ कटे.
दोनों काँधे थे रक्त सने
आँखों से अविरल अश्रु बहे.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
अंततः हमें स्वराज मिला
क्या बापू का सुराज मिला?
पहले तो लूटा ग़ैरों ने
अब लूटा है अपने पैरों ने.
मालिक जो नौकरशाह हुए
शक्ति पा लापरवाह हुए.
अधिकारों की बस चाह उन्हें
कर्तव्यों की कहाँ परवाह उन्हें?
जी भर वह शोषण करते हैं
स्वार्थों का पोषण करते हैं.
यहाँ ईमान का कोई ज़ोर नहीं
भ्रष्टाचारों का कोई छोर नहीं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
आयें जनप्रतिनिधियों को देखें
उनके करतूतों को परखें.
जनता के जो सरकार हैं ये
झूठे, गंदे, मक्कार हैं ये.
डाले समाज में ये फूटें
और दोनों हाथों से लूटें.
जाति की कोई गोटी फेंके
कोई धर्मों की रोटी सेंके.
जन्संपत्ति का करते भक्षण ये
अपराधों को दें संरक्षण ये.
सोचो निर्लज्ज ये कैसे हैं
थू है जिनपर ये वैसे हैं.
जनतंत्र का मंदिर है जहाँ
ये करते जूतम-पैजार वहाँ.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
इस धरती के असली वारिस
आज भी गाँवों में पड़े कराह रहे.
जनतंत्र के असली मालिक ये
अपने सेवक की राह तकें.
हर कोई इन्हें ही छलता है
इनके दम पर जो पलता है.
फिर भी ये तिल-तिल जलते हैं
काँटों की राह पे चलते हैं.
बस एक शाम चूल्हे जलते
बच्चे हैं दूध बिना पलते.
पृष्ठोदर एक हुए फिर भी
हैं सर पर बोझ लिए चलते.
आँखों में बुझती आस लिए
गिरते-उठते बस जीते हैं.
टूटे स्वप्नों की प्यास लिए
जीवन भर आंसू पीते हैं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
प्रणव कान्त .
इसी भारत की कल्पना की थी?
था सदियों से अपना भारत
ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ा.
'यह सूरज होता अस्त नहीं'
शासक था ख़ुद पर यूँ अकड़ा.
तुमने जब बड़ी वह तोड़ी
सोचा दुःख के बादल तो छटे.
एक आह सुनी, देखा हमने,
थे माँ के कोमल हाथ कटे.
दोनों काँधे थे रक्त सने
आँखों से अविरल अश्रु बहे.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
अंततः हमें स्वराज मिला
क्या बापू का सुराज मिला?
पहले तो लूटा ग़ैरों ने
अब लूटा है अपने पैरों ने.
मालिक जो नौकरशाह हुए
शक्ति पा लापरवाह हुए.
अधिकारों की बस चाह उन्हें
कर्तव्यों की कहाँ परवाह उन्हें?
जी भर वह शोषण करते हैं
स्वार्थों का पोषण करते हैं.
यहाँ ईमान का कोई ज़ोर नहीं
भ्रष्टाचारों का कोई छोर नहीं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
आयें जनप्रतिनिधियों को देखें
उनके करतूतों को परखें.
जनता के जो सरकार हैं ये
झूठे, गंदे, मक्कार हैं ये.
डाले समाज में ये फूटें
और दोनों हाथों से लूटें.
जाति की कोई गोटी फेंके
कोई धर्मों की रोटी सेंके.
जन्संपत्ति का करते भक्षण ये
अपराधों को दें संरक्षण ये.
सोचो निर्लज्ज ये कैसे हैं
थू है जिनपर ये वैसे हैं.
जनतंत्र का मंदिर है जहाँ
ये करते जूतम-पैजार वहाँ.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
इस धरती के असली वारिस
आज भी गाँवों में पड़े कराह रहे.
जनतंत्र के असली मालिक ये
अपने सेवक की राह तकें.
हर कोई इन्हें ही छलता है
इनके दम पर जो पलता है.
फिर भी ये तिल-तिल जलते हैं
काँटों की राह पे चलते हैं.
बस एक शाम चूल्हे जलते
बच्चे हैं दूध बिना पलते.
पृष्ठोदर एक हुए फिर भी
हैं सर पर बोझ लिए चलते.
आँखों में बुझती आस लिए
गिरते-उठते बस जीते हैं.
टूटे स्वप्नों की प्यास लिए
जीवन भर आंसू पीते हैं.
हे वीर शहीदों, क्या तुमने
इसी भारत की कल्पना की थी?
प्रणव कान्त .
सार्थक शब्द हैं,खुबसुरत कल्पना है, एक कोशिश होनी चाहिये हम बदल सकते है अपने देश को... शायद अब भी हमें खुद को बदलने की सबसे ज्यादा जरुरत है.... Hats off.....
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