मेरा जीवन -
एक महाभारत,
मेरा अवचेतन -
एक कुरुक्षेत्र,
जहाँ नित्य बनता है
संबंधों का चक्रव्यूह.
मैं
अभिमन्यु की तरह
भेदता हूँ
प्रतिदिन
चक्रव्यूह के छः द्वारों को
पर
तोड़ नहीं पाता सातवें को
भेदन का रहस्य
जानकार भी.
पहुँच कर
बिल्कुल पास
अपनी लक्ष्यसिद्धि के
घिर जाता हूँ मैं
अपनी ही प्रश्नावीथियों में.
अपने ही
प्रश्नों से संघर्षरत मैं -
यष्टिप्राण
हो जाता हूँ
पर
कर्तव्यबोध का संवेदन,
संचारित करता है
एक जिजीविषा
मेरे मन में.
मैं
एक बार पुनः
उत्प्रेरित होता हूँ
एक प्रयास के लिए
इस चक्रव्यूह भेदन का
एक नए सिरे से.
प्रणव.
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