दुनियां के
बहुत सारे पिताओं की तरह,
आप नहीं हो -
उद्भट विद्वान,
कि
विरसे में दे सको
यशस्वी ज्ञान-विज्ञान।
ना ही हो आप -
अथाह धनवान,
कि
पीछे छोड़ जाओ
सपने ख़रीद लेने का भान।
कहाँ हो आप
इतने बड़े किसान,
कि
भरा होगा अन्न-धन
आँगन-खेत-खलिहान।
ऐसे भी नहीं आप -
विपुल शक्तिमान,
कि
जिसकी हनक से हो
सत्ता के गलियारों की पहचान।
मेरे
बाबू जी !
जो आप कभी नहीं कहते,
पर
जहाँ भी जाऊँ मैं,
लोग कहते है
कि
हो आप निहायत
सरल, सुहृद, विनयी इंसान,
जिस पर
गर्वित हूँ -
मैं; आपकी संतान।
कि
विरासत में
देना चाहूँगा मैं भी,
प्यारी बिटिया को,
एक ऐसे ही
पिता की पहचान।
- प्रणव कान्त झा
२१ जून, २०१५.
बहुत सारे पिताओं की तरह,
आप नहीं हो -
उद्भट विद्वान,
कि
विरसे में दे सको
यशस्वी ज्ञान-विज्ञान।
ना ही हो आप -
अथाह धनवान,
कि
पीछे छोड़ जाओ
सपने ख़रीद लेने का भान।
कहाँ हो आप
इतने बड़े किसान,
कि
भरा होगा अन्न-धन
आँगन-खेत-खलिहान।
ऐसे भी नहीं आप -
विपुल शक्तिमान,
कि
जिसकी हनक से हो
सत्ता के गलियारों की पहचान।
मेरे
बाबू जी !
जो आप कभी नहीं कहते,
पर
जहाँ भी जाऊँ मैं,
लोग कहते है
कि
हो आप निहायत
सरल, सुहृद, विनयी इंसान,
जिस पर
गर्वित हूँ -
मैं; आपकी संतान।
कि
विरासत में
देना चाहूँगा मैं भी,
प्यारी बिटिया को,
एक ऐसे ही
पिता की पहचान।
- प्रणव कान्त झा
२१ जून, २०१५.