मंगलवार, 7 मई 2013

एहसास 2

क्यों
बयां करने को कोई दास्तां
लफ़्ज़  ज़रूरी होते हैं?
क्यों
कहने को किसी से दिल की बात
लफ़्ज़ ज़रूरी होते हैं?
कि
लफ़्ज़  होते हैं दिमाग़  की उपज
ये झूठे भी तो हो सकते हैं,
कोई कातिल भी हो सकता है
शीरींज़बान।
कोई क्यों नहीं समझता
किसी की आँखों की भाषा?
कोई क्यों नहीं पढता
किसी की आँखों में लिखी इबारत?
कोई क्यों नहीं देखता
किसी की आँखों में बसी अपनी ही तस्वीर?
कि
आँखें बोलती हैं दिल की ज़बान,
कि
आँखें ही सिर्फ़ सच बोलती हैं।
सुनने को लफ़्ज़ों की ज़बान,
ज़रूरी हैं दो कान-
ये धोखा भी दे देते हैं।
पर
समझने को आँखों की बातें-
ज़रूरी है; एक ख़ूबसूरत दिल,
कि
दिलों के एहसास-
कभी धोखा नहीं देते,
कि
कभी झूठे नहीं होते-
दिलों के एहसास।

प्रणव कान्त झा
04 जुलाई, 2004.
  

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