गुरुवार, 29 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २३

मोन'क कोन सं
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बड़का बड़का नौलक्खो सभ भहरि भहरि खसैत देखल
उजरल-उपटल, परती-परांत पर बस्ती कें बसैत देखल

नेन्ना भुटका ख़ातिर जे सभ बेचल आत्मा बीच बाज़ार 
ओ हुकरैत-चिकरैत मरला, सभ किछु के अछैत देखल

खन चोर आ खनहि साहु, रूप बदलि जे स्वार्थ सधथि
लोक-ज़माना बदलि गेलै से हुनकहुं ह'म बजैत देखल

छिया-छिया, राम-राम आब जुग ज़माना गारत भे'ल
जाहि मुँह हरसठ्ठे सुनलहुं हुनको ओतहि धंसैत देखल

जे ज्ञानी-ध्यानी, उपदेशक संसार कें मायाजाल कहल
ओहि फाँस में सभ सं आगां तिनकहि हम फंसैत देखल

जुग'क जुग जकरा ओ देखौलनि अछि पैरे तोहर स्थान
सत्ता, शासन, स्वार्थ'क ख़ातिर तकरे पैर खसैत देखल

रंग-बिरंगा जे भरि जिनगी, चिनगी लेसि जीबैत रहला
बीतला बयस में नरक'क भयवश एकरंगा रंगैत देखल

धर्म-जाति के बान्ह कसल जै रीति-रिवाज'क डोरी सं
तकरा तोड़ि आब नवतुरिया कें न'ब बाट चलैत देखल

जं गौरब इतिहास रचल, अनेति'क करिखा से पोतल
न्यायोचित इतिहास'क पथ किछु किरिन उगैत देखल

परिवर्तन छै अटल सत्य से अहीं'क गीता कृष्ण कहल
ओ पीढ़ी घोखबे टा कयलक नव पीढ़ी बदलैत देखल

- प्रणव कान्त झा
२९ सितम्बर, २०१६.







सोमवार, 26 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २२

मोन'क कोन सं
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चहु दिशि देखू मनुख मनुख कें मारि रहल अछि
स्वार्थ'क आगां आब मनुक्खता हारि रहल अछि 

नैतिकता आब राखल गेल पोथी में चौंपेति क'
जग तकरे तर्पण लेल गंगाजल ढारि रहल अछि

ढंग पुरनका क'हल जेतै सगरो लोक लाज कें
देखि क' चालनि सूप हिया परचारि रहल अछि

तागल छल ई समाज संबंध'क जाहि सूत सं  
नित दिन तकरे माँझ चौबट्टी जारि रहल अछि

सत्य धर्म नेह'क सभ जे गोड़ल'क पाताल में
से विकास'क झंडा चान पर गाड़ि रहल अछि

जकरे जिम्मेदारी भेटल जग के राह देखाब' कें
सभकें भटका क' ओ निज कें तारि रहल अछि

सदति बनौल'क धर्म नीति जग लोक रीति कें 
से धर्महि देखी जं लोकबेद कें मारि रहल अछि 

पूजे टा लेल बैसल छथि राम त' बूझू मंदिर में 
रावण'क समतूले जग काज सुतारि रहल अछि

अदौकाल सं माँ मैथिली सीबय जाहि फांट कें  
संतान सभ तकरे देखू नित्तहि फाड़ि रहल अछि

ई राति रोकय भरिसक भोरु'क नब किरिन कें
किछु दीप तैयो आस'क टेमी बारि रहल अछि

- प्रणव कान्त झा
२७ सितम्बर, २०१६.


शनिवार, 24 सितंबर 2016

दिल की बातें - 36

रोई न आँखें यूँ न समझ कोई ग़म नहीं 
बिखरा तो बार बार मगर सब्र कम नहीं 
 
सुने हैं जहां के तंज़, रोया है दिल बहुत
ये और बात कि पलकें मेरी पुरनम नहीं

दर्दे दिल के लिए है शिफ़ा उसकी हँसी 
ज़ख़्मे दिल का यहाँ है कोई मरहम नहीं

ज़ुल्म हैं सहे बहुत रिश्तों के निबाह को
उसके दिल में मगर इक ज़रा रहम नहीं 

चला जो उसके दर से मैं होके बदग़ुमान
रोक लेते मेरे पाँव, ऐसी थी क़सम नहीं 

नादानियाँ मेरी, सबको बेपर्दा कर गईं
जाना है उसे ख़ूब, अब कोई वहम नहीं 

इश्क़ और वफ़ा कि जैसे गुज़री उम्र हो
चाह के मिलेगी जो अब इस जनम नहीं 

ख़ुद ही चुनी किरचें मैंने टूटे ख़्वाबों की
तोड़ दे जो हौसला है किसी में दम नहीं 

एक दिन तो ले आऊँगा अपने घर ख़ुशी
राह मुश्किल हो मगर रुके हैं क़दम नहीं

- प्रणव कान्त झा
२५ सितंबर, २०१६.

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २१

मोन'क कोन सं
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ई जे नबरंग'क संसार भेलै से की करबै
आन्हर-बहीर राजा भ गेलै से की करबै

सब धान बाइस पसेरी सगरो तौल रहल
रिति विचित्र सरिपहुं भेल एत्तै की करबै

राकस पहिरन बदलि सगर दुनियाँ घूमय
आब सन्यासी ब्योपार जुमाबै की करबै

यौ प्रजातंत्र में नबका रजबाड़ा देखलहुं 
फेर घरही युवराजो देखबै त' की करबै

अपटी खेत में रक्षक जान गमाबैत अछि
आ मगरमच्छ सभ नोर गिराबै की करबै

कांकोड़ सन अपन'हिक टाँग घिचैत रहू
कुकुर-बिलाड़ि आँखि देखाबै की करबै

सुपथ गप्प जं बजलहुं, हैत जहल बौआ
गामो रावणे'क जयकारा चाहै की करबै

सभटा छुतहर घैल त' भांगठे भेल छलैक
आब नबको बासन छुतहा भेलै की करबै

हारू हिय जुनि हेतै किछु परिवर्तन संगी
किछु समये जं बेपरीत भेलै से की करबै

- प्रणव कान्त झा
२१ सितम्बर, २०१६.

मैथिली रचना - २०

मोन'क कोन सं
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जिनगी'क साँच-झूठ से सभ हेरिते रहब
हमरा जीवन जिउबा'क से जिबिते रहब

बाट थिक की उचित आओर की सुभीत
बुझू आहां हम त' न'ब बाट चलिते रहब

धर्म-जाति'क भेद आहां कसि धयने रहू
हम ई बन्हन कें तोड़ि आगां बढ़िते रहब

चोट माँझ बाट देब अछि हिस्सक पुरान
नबतुरिया छी ह'म से बरु सम्हरिते रहब

छै इनारे घोरायल भांग कौचर्ज'क एतय
हमरा कर्म'क नशा से बस मताइते रहब

- प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१६.

मैथिली रचना - १९

मोन'क कोन सं
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छल निजगुत हमर एकटा खोंता एतै
बूझल छल कहाँ जे बिखरि ई जेतै

सभ अप्पन रहय खाम्ह ढाहय बला
आसहि टा रहल घ'र सम्हरि ई जेतै

भेल चेतौनी सेहो नहि मानल मोदा
सोचल जे भरोस की भहरि ई जेतै

आब बसाते बहल छै माहुर सं भरल
हमरा कहने की अन्हर ठहरि ई जेतै

तैयो हिय में रहल अगबे नेहे सरल
सगरो संसार धरि की पसरि ई जेतै

मोन होइए जे कनितौं मोदा की करू
जं कानब त' दुनियाँ बदलि की जेतै

- प्रणव कान्त झा
२३ अगस्त, २०१६.

मैथिली रचना - १८

सनेस
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जुनि सोचब ई प्रश्न जे औखन
ह'म कतय आ आहां कतय
भाव-सोच स' जं एक रहब सभ
फेरि व्यर्थ प्रश्न जे के कतय

कतहु रही आ कहुना रही मोदा
ई अखियास औ मीत रहय
माय मैथिली सन हित-मीत नहि
सदति सभ'क ई मोन बसय

गौरब बरु सभ अतीत पर राखब 
ई समय, कर्म सेहो मोन रहय
आजु'क कर्महि सं महल बनत ओ
संतति अतीत जे स्मरण करय

बांटल खंडित-खंडित जे सभ कियो
होयब से एक कहिया आ कतय
बिनु एका'क हो उदय नहि किन्नहुं
ई सत्य सदति अखियास रहय

सभ भूल-चूक, लेनी-देनी कें बिसरि
संग चली आ'ब संकल्प रहय
रहत जं कर्म-भाव-आत्मा पवित्र त'
भेंटत सदिखन उद्देश्य अभय

- प्रणव कान्त झा
२९ जुलाई, २०१६.