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बड़का बड़का नौलक्खो सभ भहरि भहरि खसैत देखल
उजरल-उपटल, परती-परांत पर बस्ती कें बसैत देखल
नेन्ना भुटका ख़ातिर जे सभ बेचल आत्मा बीच बाज़ार
ओ हुकरैत-चिकरैत मरला, सभ किछु के अछैत देखल
खन चोर आ खनहि साहु, रूप बदलि जे स्वार्थ सधथि
लोक-ज़माना बदलि गेलै से हुनकहुं ह'म बजैत देखल
छिया-छिया, राम-राम आब जुग ज़माना गारत भे'ल
जाहि मुँह हरसठ्ठे सुनलहुं हुनको ओतहि धंसैत देखल
जे ज्ञानी-ध्यानी, उपदेशक संसार कें मायाजाल कहल
ओहि फाँस में सभ सं आगां तिनकहि हम फंसैत देखल
जुग'क जुग जकरा ओ देखौलनि अछि पैरे तोहर स्थान
सत्ता, शासन, स्वार्थ'क ख़ातिर तकरे पैर खसैत देखल
रंग-बिरंगा जे भरि जिनगी, चिनगी लेसि जीबैत रहला
बीतला बयस में नरक'क भयवश एकरंगा रंगैत देखल
धर्म-जाति के बान्ह कसल जै रीति-रिवाज'क डोरी सं
तकरा तोड़ि आब नवतुरिया कें न'ब बाट चलैत देखल
जं गौरब इतिहास रचल, अनेति'क करिखा से पोतल
न्यायोचित इतिहास'क पथ किछु किरिन उगैत देखल
परिवर्तन छै अटल सत्य से अहीं'क गीता कृष्ण कहल
ओ पीढ़ी घोखबे टा कयलक नव पीढ़ी बदलैत देखल
- प्रणव कान्त झा
२९ सितम्बर, २०१६.