गुरुवार, 16 मई 2013

चाहता हूँ मैं

मैं
अभिलाषित हूँ-
छूने को सीमाहीन, क्षितिजहीन
नीलगगन को
एक लम्बी उड़ान के बाद।
पर,
हूँ विवश मैं,
कतर दिए गए हैं पंख मेरे-
अपने कर्तव्यनिर्वाह के लिए।
मैं
उत्कंठित हूँ-
नापने को नीलहरित, तटहीन
वारिधि की
अथाह, निस्सीम गहराई को।
पर,
हूँ अवश मैं,
कर दिया गया हूँ हस्तपाद विच्छिन्न-
लोकलज्जा के भय से।
मैं
स्वप्निल हूँ-
क्षितिज मिलन को,
पाने को आत्मा की स्वतंत्रता;
विवशता की बेड़ियों में जकड़ा।
और तोड़कर
बंधनों को सारे
एक दिशाहीन, अंतहीन
यात्रा पर निकलना
चाहता हूँ मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 1998. 

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