एक ख़राश मगर क़िस्मत के नगीने में रहा
आब ए ज़मज़म की तरह बाँटता जो ख़ुशी
ख़ुद ग़म के दरिया में भी टूटे सफ़ीने में रहा
ज़ार-बेज़ार किया इश्क़ मैंने जब भी किया
रेज़ा-रेज़ा हुआ दिल फिर भी क़रीने में रहा
ज़रा क्या दूर हुआ, ग़ीबत मेरी शुरू कर दी
और जो राज़ उसका, ज़ब्त मेरे सीने में रहा
उसकी क़ुरबत ने तो कई बार बेईमान किया
जो हुआ दूर, ईमान का सुक़ूं मेरे जीने में रहा
- प्रणव कान्त झा
२३ दिसंबर, २०१५.