बुधवार, 23 दिसंबर 2015

दिल की बातें -10

महकती शाम चहकती सुब्ह का शैदाई मैं
एक ख़राश मगर क़िस्मत के नगीने में रहा

आब ए ज़मज़म की तरह बाँटता जो ख़ुशी
ख़ुद ग़म के दरिया में भी टूटे सफ़ीने में रहा

ज़ार-बेज़ार किया इश्क़ मैंने जब भी किया
रेज़ा-रेज़ा हुआ दिल फिर भी क़रीने में रहा

ज़रा क्या दूर हुआ, ग़ीबत मेरी शुरू कर दी
और जो राज़ उसका, ज़ब्त मेरे सीने में रहा

उसकी क़ुरबत ने तो कई बार बेईमान किया
जो हुआ दूर, ईमान का सुक़ूं मेरे जीने में रहा

- प्रणव कान्त झा
२३ दिसंबर, २०१५.

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

दिल की बातें - 9

दुनियाँ को जान लेने का ना दावा कर
ख़ुद को ऐ नादां तू जान ले तो समझूँ
जो चाहती कि तुझे, जाने-माने दुनियाँ
ख़ुदी को ख़ुद की पहचान दे तो समझूँ
मान देते सभी को, जो मानते ख़ुद को
ज़रा सी बात जो तू मान ले तो समझूँ
होती है आजकल, जान लेने की बातें
ज़िन्द देते हुए कोई जान दे तो समझूँ
- प्रणव कान्त झा
०८ दिसंबर, २०१५.

मैथिली रचना - ७

ओहिना... किछुओ...
साओन-भादब बीतल हे
सखि आओल जाढ़
पिया सं दूर पियासल रे
मोन बिलमल ठाढ़ि
ठोर भरि मुस्की छारल रे
दृग भरल अखाढ़
धन सुनलहुं पिय अओता हे
धारल नब पाढ़ि
- प्रणव कान्त झा
०७ दिसंबर, २०१५.

दिल की बातें - 8

जुदा जो तुझसे हूँ तो दर्द बहुत है दिल में
साथ होने की भी क़ीमत तो सज़ा जैसी है।
तेरी हंसी, ये समझ रुह का वुज़ू है मेरे
तेरे आँसू, मेरी इबादत में क़ज़ा जैसी है।
मैं तो काफ़िर, है तुझे जो ईमां तो समझ
कि ये जुदाई भी ख़ुदाई की रज़ा जैसी है।
- प्रणव कान्त झा
१८ अक्तूबर, २०१५.