शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 17

हर ग़ाम बिछती है यहाँ शतरंज की बिसातें 
कि हर कोई अपनी-अपनी गोटी फैंकता है

जल रही है यां आग ख़ुदगर्ज़ी की हर तरफ़ 
औ' कोई दूर बैठा अपनी ही रोटी सेंकता है

कल तलक थे जिसे सब मालिकां समझते
अब नौकर ही उनको हड्डी-बोटी फैंकता है

उसके तालिबां ही देखो उसे देते सबक़ अब
और जो उस्ताद था चुपचाप बैठा देखता है

हैं जो अच्छे-भले, बिखरते रहे यां-वहाँ पर
गुनहगारों में तो देखो कि कितनी एकता है

- प्रणव कान्त झा
२६ फ़रवरी, २०१६.

दिल की बातें - 16

नमाज़ ए इश्क़ के कलमे तुझे कब याद रहे
मेरे दिल ने दुआ की फिर भी तू आबाद रहे

राह ए इश्क़ कहाँ आसान दौर कोई भी रहा
जो भी राहरू रहे इसके अक्सर बरबाद रहे

सफ़र ए ज़िंद में नाकाम मैं कई मरहलों पे
मगर तेरा सफ़र तो हर मोड़ पर नाबाद रहे

दिल ए नाशाद मैं हरदम खड़ा राहों में तेरी
कूंचा ए यार तेरा हर वक़्त ही पर शाद रहे

बड़ा हूँ ख़ुशफ़हम, इतना ही से ख़ुश रहूँगा 
दिल ए नाज़ुक में अपनी भी कोई याद रहे

- प्रणव कान्त झा
२२ फ़रवरी, २०१६.

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

मैथिली रचना - १२

हे 
बरू ठीके 
कहैत छह तों!
ई जे
पैघ लोक सभ
(जाति सं, मोन सं नहि)
आई
खौंझायल, 
फनफनाइत छथुन
भरि बाकुट मिरचाई लागल सन,
से ई
वैह छथि
जे काल्हि तक
तोहर अधिकार कें 
पोन त'र दबा
भीखो जकां देबा सं करैत छलाह
नामंज़ूर।
तोहर
ख़ून पसीना कें
राकस सन चूसि
लाल बुन्न भेल रहैत छलाह जे
तनिका
आब ज'र धरैत छन्हि
तोहर
फहराइत
हनुमानी पतक्खा देखि।
ठीके 
कहैत छह तों
जे 
भेटबाक चाही तोरो
बरोबरि होयबाक हक्क
आ से बरु 
भेंटिये रहल छह आई
(खाह ओ भरम'ले सन)।
देखह
काल'क डांग
जे 
काल्हि छोट आ नीच कहि
मौगति करैत
छलथुन्ह तोहर
से
छोट आ नीच 
कहयबाक लेल
आंदोलन करैत छथि आई।
से
बरु आई
जे सत्ता'क कुंजी
तोरा हाथ
त' 
तोंहूं ज' करह
ओहने व्यवहार
लएह अपन प्रतिशोध
त' से बेजाय नहि -
अन्याय तं किन्नहुं नहि।
मुदा संगी,
रखिह' 
ई सदति मोन
जे समय के चक्का जड़ नहि
ओ घुमैत रहैत अछि
सदिखन
से 
जे काल्हि उप्पर ओ आई निच्चां
एकर उनटो ओतबहि साँच।
हे मीत
रखिह' अखियास
जे 
जं आँखि'क सन्ता आँखि 
आ 
हाथ'क सन्ता हाथें भ' जाय न्याय
त'
सगरो दुनियाँ 
भरि जायत लुल्ह आ आन्हर सं।
ओना
जं ई पैघ लोक सभ
देखओने रहितथि मोन'क
अस्सल पैघत्व 
त' बेगरते कोन छल 
अहि सभ'क,
त' दोस!
तोंही करह मोन कें पैघ
आ 
करह क्षमा पुरखा सभ कें
सुनल जे
क्षमा सं पैघ कोनो प्रतिशोध नहि।

- प्रणव कान्त झा
२२ फ़रवरी, २०१६.

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

मैथिली रचना - ११

सदिखन जाय अनभुआर डांरि
गौरबे आन्हर जे भेल फिरय
अप्पन सहरजमीन जे बिसरल
ठोकर खाय मुँह भ'र गिरय

परभाखा बरु मौसिए सन नेही
माय'क आंचरक गन्ह कतय
अप्पन सन कतबहु ओ लागओ 
परदेस में माटि'क रंग कतय

जानि कोन पापें देस छुटल अछि
आबहु चेतू औ मैथिल प्राण
माय केर जं सम्मान देलहुं नहि
केहन होयत भावी संतान

माय'क मुँह सं सुनल-गुनल जे
जाहि सं भेटल जीवन'क ज्ञान
पहिलुक आखर 'माय' सिखौलक
माय'क बोल मैथिली कें प्रणाम

- प्रणव कान्त झा
२१ फ़रवरी, २०१६.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 15

अब तो वो लोग रहे ना ही लगावट पहले जैसी
देखते देखते किस तरह से यह नज़ारा हो गया

कल तलक हिल मिल कर हँसते बोलते थे घर 
कैसी हवा चली कि ज़ख़्मी ये भाईचारा हो गया

उस शहर में सब ही साँझा बाँटते ख़ुशी ओ ग़म 
तकसीम इस तरह क्यों सबका किनारा हो गया

अब तो हमने तुमने बदले हैं रंगो बू के भी मायने
यूं मज़हबों को भी रंगे ख़ूं का ही सहारा हो गया

सारे बुज़ुर्गो पीर बताते रहे मुहब्बत के फ़लसफ़े
दरमियाँ नफ़रतों का शोला क्यों शरारा हो गया

शोर चारों तरफ़ है बरपा सब अलग अलग खड़े
तू ही सही, यूँ तो इंसानियत का ख़सारा हो गया

- प्रणव कान्त झा
१८ फ़रवरी, २०१६.

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 14

किताब ए ज़िंदगी के हरेक सफ़्हे ने मेरी
तेरी बख़्शीशों का हिसाब छुपा रक्खा है

होता जो पास तेरे क़दम ही चूम लेता मैं 
मेरा हर दर्द यूँ तूने दिल में दबा रक्खा है

तेरे नाम ही से मिल जाती दिल को राहत
जैसे तपती रेत पे किसी ने सबा रक्खा है

मर्ज़ ए जहान की दवा तो होगा कोई खुदा
यां इलाजे ग़म की शिफ़ा तूने दुआ रक्खा है

- प्रणव कान्त झा
१४ फ़रवरी, २०१६.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 13

ज़िंदगी गर तुम बेवफ़ा हो तो रहो
उसकी हर साँस में तारी है वफ़ा 

सारे जहान से नाराज़ बेशक हो रहे
अपने महबूब से कब होता है ख़फ़ा

सबके दर्द का है अब एहतराम उसे
सौदा ए इश्क़ में जो मिली है जफ़ा

जाहिरन जो दिखता नुक़सान यहाँ 
रुह के ग़ल्ले में बन गिरता है नफ़ा

रंग-ए-इश्क़ में ज़ोर बहुत होता है
खोटे को खरा करता है बाज़ दफ़ा

- प्रणव कान्त झा
०५ फ़रवरी, २०१६.


बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

मैथिली रचना - १०

ओहिना... किछुओ...

काग कुचरैत देखल अहि मरुभूमि में
गाम सहजें हमर फेरि मोन पड़ि गेल।
चान बूझल रहय मोन शीतल करय
मुदा सैह चान हृदय'क कोन गड़ि गेल।

मोन पड़ि गेल बाबा कें खिस्सा-कथा
आओर बाबी के आँचर कें नेहो सखा
ओ चिंतित सदति भावी लेल हमर
कने खटगर आ मिठगर हमर जे पिता
दूध-भात'क जे बाटी लेने हाथ में
आगा-पाछां करैत माय मोन पड़ि गेल।

छल कितकित खेलैत, कनियां-पुतरा सेहो
छोट बहिन बहिनपा कें चंगो करैत
सुनि सांझ पहर भूत प्रेत'क कथा
भरिदिनुक सभ बहादुर छलहुं जे डरैत
इस्कूलो जाय संग रहय खेलो में
सभ संगी ओ नेनपनि कें मोन पड़ि गेल।

खेत पोखरि घुमैत, खेलैत आ पढ़ैत
हमहूं बढ़ि गेलहुं साल आगां बढ़ल
छुटल गाम'क मीत, न'ब संगी बनल
नब उमंगो चढ़ल किछु सपनहुं गढ़ल
चललहुं हम जखन गाम'क सीमान धरि
नेह भरि जे चलल नैन मोन पड़ि गेल।

मन-मनोरथ कें पाछां भागैत चलैत
चलि अयलहुं जे हम परदेस में
मोन अछि जे मुदा खन-खन ल' चलय
अपनहि माटि में, अपनहि देस में
गाम हम्मर जे मोन'क खज्जन चिड़ै
जानि कोन चिल्होरि ल' सोन उड़ि गेल।

प्रणव कान्त झा
०३ फ़रवरी, २०१६.