शनिवार, 20 जुलाई 2013

बाबू जी

बाबू जी,
आभारी हूँ मैं 
सदैव आपका 
कि 
धृतराष्ट्र की तरह
पुत्रमोह में पड़-
दुर्योधन नहीं बनाया मुझे।
आपके
शब्दों की प्रेरणा
कि
'न्यायोचित और मानवोचित मार्ग ही चलना सदैव'
डिगने नहीं देते
कदम मेरे
मुश्किल घड़ियों में भी
जब
बहुत आसान होता है
पथ से विचलित होना
अक्सरहां।
बाबू जी,
मैं कृतज्ञ हूँ
आपका हमेशा
कि
मेरे बचपन से ही
अपने
कठोर अनुशासन के आवरण में
छुपा कर
अपने पितृस्नेह को-
आपने गढ़ा मुझे।
आप ही का
सृजन-
आज
जो भी हूँ;
एक नर्म दिल, न्यायोचित, संवेदनशील, कर्मशील
और
सबसे महत्वपूर्ण
कि
एक मनुष्य बनने को प्रयासरत-
मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जून, 2013.

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