मंगलवार, 7 मई 2013

दिल की बातें - 1

जख्म हर बार नए कुछ मिले गहरे
चल पड़ा जब भी मैं दवा  ढूँढने,
सांस घुटने सी लगी जब बैठे-बैठे
बाद मुद्दत के निकला मैं हवा ढूँढने।

हादसे ऐसे भी हैं ज़िन्दगी में मेरी
बज़ाहिर जो बेवजह तो हैं भी नहीं,
जाता हूँ उलझ अपने ही सवालों में
जब भी निकला हूँ  कोई वजह ढूँढने।

कुछ जुर्म किये तुमने सरेराह मेरी
जानती हो तुम उनकी तलाफ़ी है नहीं,
ख़ुद को भी पाता हूँ गुनाहगार कहीं
निकला तेरे वास्ते जब सज़ा ढूँढने।

इश्क़  में हासिल है सनम की वफ़ा
हर तरफ़ बस यही देखा है सुना,
मुझको तो मिले हैं सभी माहिरे जफ़ा
निकलूँ जब भी बावफ़ा ढूँढने।

अपनी ख़ुदी  भी साथ देती नहीं
जा रहा मैं जमाने की रजा  पाने,
हर नज़र ख़ाली, लब ख़ामोश यहाँ
किसे कहूँ कि चल प्यार की सदा ढूँढने।

प्रणव कान्त झा
२५ जून, २०१२



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