ख़ुशबू को किसी ने नहीं देखा,
हवा को भी किसी ने नहीं देखा।
ममता को किसी ने नहीं देखा,
दुआ को भी किसी ने नहीं देखा।
इश्क़ को किसी ने नहीं देखा,
ख़ुदा को किसी ने देखा है क्या?
नहीं,
ये तो बस यक़ीन हैं;
पाने को इन्हें
ज़रुरत है एहसास की।
हाँ,
बस
एहसास ही काफ़ी है
इनके होने का।
प्रणव कान्त झा
28 जून, 2004.
हवा को भी किसी ने नहीं देखा।
ममता को किसी ने नहीं देखा,
दुआ को भी किसी ने नहीं देखा।
इश्क़ को किसी ने नहीं देखा,
ख़ुदा को किसी ने देखा है क्या?
नहीं,
ये तो बस यक़ीन हैं;
पाने को इन्हें
ज़रुरत है एहसास की।
हाँ,
बस
एहसास ही काफ़ी है
इनके होने का।
प्रणव कान्त झा
28 जून, 2004.
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