सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

मैथिली रचना - ३६

चुमाओन
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पहिल बेर 
जहिया धकिया देल गेलहुं अनचोके
निश्छल मनुक्खता'क शीतल छांहि सं
धर्मक धधकैत आँच लग
आ 
पारि देल गेल एकटा गोखुर जकां
'अग्नि'शिखा माथ पर;
दहकैत रहल अछि तहिए सं मोन-मस्तिष्क 
छद्म गौरबक धाह सं।
पछाति
घीचि लाओल गेलहुं 
जाति-वर्णक करिआयल खोह में
गरदानि देल गेल पाँच तानीक जुन्ना सं
संस्कार'क ना' पर
से जरैत रहल सौंसे गात
पझाइत अहं केर आगि सं;
जे खन-खन अखनहुं लहकैत अछि -
छाउर होइत समयक बीच।
पुरखाक ऋण बेमाक करबा लेल
घुमाओल गेलहुं - अग्निकुंडक चारू भ'र
हविष्य होइत रहल जिनगी'क सभटा मनोरथ
करबा लेल ताहि संबंध'क निमाह;
झरकैत रहलहुं एकहक साँस सदिखन।
जिउबा'क लेल सार्थक जिनगी
द' रहलहुं नित्तह अग्निपरीक्षा,
कहकह सुनगैत कर्तव्य पथ पर चलैत,
पयर दगाह होयबा सं बंचबाक प्रयास में;
दग्ध होइत आत्मा पर
पड़ि रहल फोंका - अविश्वासक।
से जेना कि कहैत अछि सभ,
जे करैत अछि काट -
लोहे लोह कें, माहुरे माहुर कें आकि दाहे दाह कें,
तहिना
सभ विधि-व्यवहारक संग भेंटल -
माय'क देल चुमाओनक ऊष्मा,
करैत रहल शीतल हिय कें;
जेना कि
जेठक रौद सं तप्पत मांटि कें
शीतल करैत अछि -
पुरबाक तोर संग बरसैत बुन्न।
आ आइयो
ओ सिनेह सं भरल ठोर'क स्पर्श - 
हम्मर लिलार पर,
भरि दैछ - जिजीविषा आ उत्साह,
सभ अगुरबान सहबा लेल;
जे समधानैत रहत - समय आ समाज,
जिनगी'क समर में - हमरा पर।

- प्रणव नार्मदेय 
१३ फ़रवरी, २०१७.

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