शनिवार, 20 जुलाई 2013

बस इतनी सी ख़्वाहिश है

देखते - देखते 
साल बीत गया यह भी। 
मुड़ कर देखूँ तो 
पता ही नहीं चला 
कब बीत गए
जीवन के 33 साल?
इन सालों में;
हरेक साल ही
लिए संकल्प-
कुछ पूरे, कुछ अधूरे।
हरेक साल के
साथ जुड़ी हैं यादें-
कुछ कड़वी, कुछ मीठी।
हरेक साल में
बने हैं रिश्ते, जिनसे
कुछ दर्द मिले कुछ खुशियाँ।
हरेक साल के
थे अपने कुछ लक्ष्य-
और
अपने तईं जी-जान लगाया
पूरा करने को उन्हें।
अब, जब आज
रुका हूँ लेने को सांसें
तो
देखता हूँ की
बीत गए 33 साल।
लगता है
अभी तो कुछ किया ही कहाँ?
देखने को हैं - सपने बाँकी बहुत
सुनने को है- आवाज़ वक़्त की
छूने को हैं- लक्ष्य अनछुए बहुत
करने को हैं- बदलाव कई
पाने को है- सारा जहां बांक़ी
लेने को हैं- संकल्प और कई
और सबसे ऊपर
लौटाने को हैं- कर्ज़ उन सबके
दिया है जिन्होंने
परवरिश, सपने, आशाएँ, विश्वास और मुस्कान
मेरे जीवन को।
बस इतनी सी ख़्वाहिश है
आने वाले साल में
मेरी।

-प्रणव कान्त झा।
31, दिसंबर, 2012।
जालंधर।

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