मंगलवार, 31 मई 2016

अवशेष

मेरा प्रेम
कोमल पत्तों की तरह
रहा हरदम
तुम्हारे ही रसवन्त
शिराओं के सहारे 
रहा हरा-भरा।
तुम्हारी इच्छाएँ 
विस्तृत होती रहीं
चहुँओर 
कि जैसे फैलती हैं शाखाएँ 
और 
मेरा प्रेम
होता रहा द्विगुणित,
होता रहा और भी गहरा धानी,
सहलाता रहा
तुम्हारी उद्दाम लालसा को
देता रहा ठंडक।
तुम्हारी असीम
ममता और समर्पण
भरती रही 
मुझमें मस्ती, चापल्य
और
तुम्हारा रसवन्त 
बन कर मेरा प्रेम 
किसी संक्रमण की तरह
फैलता रहा चंहुदिशि,
बरसता रहा
सब पर समान - 
जो भी आए इसकी सीमा में।
फिर 
शायद नहीं भाया तुम्हें 
मेरा स्नेह लुटाना
सबपर
तो
अचानक ही 
संकुचित कर दिया
रस प्रवाह
पीला पड़ने लगा
मेरा उत्साह,
रसहीन हो
सूखता गया नेह।
अब
शुष्क, प्राणहीन सा
मैं गिर कर
विलग हो रहा 
शनै: शनै:
यहाँ-वहाँ गिरता
पड़ रहा हूँ 
फिर
टिकता जिस भी ठौर
वह शुष्क अवलंब
समाहित कर लेना चाहता
स्वयं में
अपनी उर्वरा के लिए
तुम्हारे नेह के 
इस अवशेष को।

- प्रणव कान्त झा
३१ मई, २०१६.

दिल की बातें - 26

इक मेरा मिज़ाज सह नहीं पाते
मेरे दर्द सर लेने की बात करते हैं 

मेरी सदाएं जिन तक नहीं पहुँची 
दिल तक पहुँचने की बात करते हैं

ख़ुद को ही जो समझ न पाएँ वो
मेरा मन समझने की बात करते हैं

कि जो क़दम भटक रहे हैं अब तक
मेरे रुह को थामने की बात करते हैं

चलो दिल तुम भी देख लो उनको
तुमसे किस किस की बात करते हैं

उन दिलों को कब सुकून देगा रब
जो न मिलना उसी की बात करते हैं

- प्रणव कान्त झा
३० मई, २०१६.

सोमवार, 30 मई 2016

दिल की बातें - 25

इश्क़ का साग़र ख़ाली-ख़ाली मुझमें है
इक तन्हाई मुझमें भरा है वक़्त ने दोस्त

खुल कर हँसते खेलते हम भी तेरी तरह
पर मुझमें यह दर्द भरा है वक़्त ने दोस्त

दिल शीशे सा नाज़ुक साफ़ था मेरा भी
इस पर कैसा ग़र्द धरा है वक़्त ने दोस्त

जिस चेहरे पर रंगे मुहब्बत खिलता था
स्याह रंग सा पोत रखा है वक़्त ने दोस्त

कि जिन आँखों ने सपने चाँद के देखे थे
वां अमावस कर रक्खा है वक़्त ने दोस्त

एक संवरता घर था प्यारा शहर में वो
कैसे तो बर्बाद किया है वक़्त ने दोस्त

आती थी महफ़िल में जिससे जान कभी
उसको तन्हा सफ़र दिया है वक़्त ने दोस्त

- प्रणव कान्त झा
३० मई, २०१६.

दिल की बातें - 24

ज़िन्दगी है नहीं आसान ये माना
मुश्किल भी कहाँ ठान लो ग़रचे

अजनबी कोई हो जाता है अपना
तुम भी उसे अपना मान लो ग़रचे

अन्जाना कोई इंसान कहाँ रहता
ज़रा कोशिश कर जान लो ग़रचे 

ख़ुद से ख़ुद की जंग हार ही जाते
यों जीत के सारा जहान लो ग़रचे 

सारी दुनियां लगती है ख़ुशगवार 
घर में अमन ओ आमान हो ग़रचे 

सफ़र के दरमियाँ होती है आसानी
साथ अपने थोड़ा सामान लो ग़रचे 

- प्रणव कान्त झा
३० मई, २०१६.








रविवार, 29 मई 2016

दिल की बातें - 23

कोई छूते ही जल जाए जो
इक आग सी क्यों मुझमें है

मेरा दर्द बाँट कर वो दर्द ले
इक चुभन जो क्यों मुझमें है

वो मेरे संग-संग मरता रहा
ऐसा ज़हर ये क्यों मुझमें है

जो भी था मेरा अब है कहाँ 
पर ख़्वाहिशें क्यों मुझमें हैं

ना मैं पा सकूँ ना वो आ सके
फिर जलन सा क्यों मुझमें है

मुझे चाहती तू जो बोल क्यों 
ज़रा बोल भी दे क्या मुझमें है

- प्रणव कान्त झा
२९ मई, २०१६.

शनिवार, 28 मई 2016

दिल की बातें - 22

मेरे दर्द से गर दवा हो किसी की
दुआ में ज़रा सा मैं और दर्द माँगूँ

अगर आह मेरी सुकूं दे किसी को
तो ये फ़र्ज़ मुझको और दर्द माँगूँ

सबकी ख़ुशी से मेरा ग़र्ज़ है दिल
कि सबकी ख़ुशी को मैं दर्द माँगूँ

मेरे दिल की ज़र्दी बने तेरी सुर्ख़ी
तो दिल ज़र्द हो, इतना दर्द माँगूँ 

मेरी मौत ही गर ख़ुशी हो तेरी तो
मर जाऊँ हंस कर इतना दर्द माँगूँ 

- प्रणव कान्त झा
२९ मई, २०१६.

दिल की बातें - 21

कहती रहीं मेरी आँखें राज़ ए दिल लेकिन
मैं उसकी ज़िन्दगी में कोई पहला तो न था

कब कहता उसे कि इश्क़ ने मुझे भी छुआ
मेरी ज़िन्दगी में एक यही मसला तो न था

उसको दिल जीतने की बहुत लत थी लगी
मैं कोई खेल की बाज़ी का दहला तो न था

जो सबने देख लिया वो समझ ही ना पाया
ये अक्स ए तसव्वुर इतना धुँधला तो न था

चलो छोड़ो भी, टूटा जो दिल ग़रीब का था
घर मिट्टी का ये शेख़ का नौमहला तो न था

आप बहके उन आँसुओं से, आप ही जानो
वो दानिश थे, दिल उनका बहला तो न था

- प्रणव कान्त झा
२८ मई, २०१६. 

बुधवार, 18 मई 2016

मैथिली रचना - १६

ई आँखि 
रहैत अछि सदिखन
सपनायल सन, 
दिन हो वा राति
देखैत अछि सपना-
नेह सं बान्हल परिवार'क
सुख-शान्ति सं भरल घर'क
सिनेह सं जुड़ल द'र-दियाद'क
प्रेम आ विश्वास सं गछारल गाम'क।
अप्पन'क सुख लेल,
संसार छोड़बा'क सपना
त'
संसार'क सुख लेल,
अपनहुं कें त्याग'क सपना
देखैत अछि
ई आँखि।
ई आँखि 
भरल उछाह सं
जौखन रहैत अछि-
हित-मीत, स'र-समाज'क बीच,
ई आँखि 
सरल सिनेह सं
जौखन रहैत अछि-
क'र-कुटुम्ब, स'र-समांग'क संग।
ई आँखि 
जरल अंगोर सं
जं देखल कतहु-
पाखंड, अनेति आ अन्याय,
ई आँखि 
सजल नोर सं
जं होइछ कतहु-
बेबस, बेकल आ अनुपाय।
ई आँखि
संजोगैत अछि पियास
एकटा सपना पुरला बाद
नब-नब सपना देखबा लेल,
ई आँखि
संजोगैत अछि आस
एकटा सपना टुटला बाद
बेपरीत समय सं लड़बा लेल।
औ मीत!
जं बुझ' चाही हमरा
त'
नहि देखू हम्मर 
घर-घरारी, कपड़ा-लत्ता, जुत्ता-छत्ता,
आइद-ओकाइद आ कि ज'र-जथा।
बरु देखू अहि
छोट आँखि'क पैघ-पैघ सपना,
ओकरा साँच करबा'क निस्सन ज़िद्द,
आँखि'क अंतिम जोइत तक
आ 
पौरुख'क अंतिम साँस तक
आ कि 
तकरा बादो चाहब ह'म
जे भटै ई आँखि 
कोनो जोइतहीन सपनजीबी कें,
आ फेरि देखय
ई आँखि- 
नब-नब सपना
यैह थीक अंतिम साँच 
जे देखय ई आँखि।

- प्रणव कान्त झा
१८ मई, २०१६.


मैथिली रचना - १५

'विश्व मातृ दिवस' पर संसार'क सभ माय कें अहि अकिंचन पूत'क हिय सं नमन! आहां सभ'क बिनु अहि सगरो संसार'क कल्पनो नहि कयल जा सकैछ। मानवता सदिखन आहां सभ'क अनुगृहीत अछि। 

अकास'क ऊँचाई,
समुद्र'क गहींराई,
धरती'क विशालता,
फूल'क कोमलता,
नदी सन सरलता,
ओस सन शुद्धता,
सुरुज सन प्रखरता,
चान सन शीतलता,
बर्फ़ सन उज्जवलता,
शशक सन निश्छलता
गऊ सन वात्सल्य 
प्रकृति'क ममत्व
ई सभ जं कत्तहु एकठाम भेंटि जाय
त' बुझु आओर कियो नहि, 
ओ होयतीह - माय.

- प्रणव कान्त झा
८ मई, २०१६.

रविवार, 1 मई 2016

मैथिली रचना - १४

दस बरख'क
ओ 'छोटुआ'
(अस्सल ना' त' ओकरो कहाँ छै अखियास)
आइयो 
भोरे सं मोस्तैज छै
'दिल्ली जलपान घर' क
मोरी में घसैत
अंइठ बर्तन-बासन
ग़ल्ला पर बैसल
ओकर सेठ
बिक्खिन गारि सं होलियौने छै ओकरा
एकटा पंचटकही 
शीशा कें गिलास टुटला सन्ता।
दोकान'क
सोझे-सिमाने
पाँचसितारा अस्पताल'क
बनैत इमारत'क डेराओन सीढ़ी पर
उप्पर-निच्चां करैत
माथ पर पजेबा'क थाक
उघैत नौजुआन दुलरिया,
माथ सं टघरैत पसीना में
आइयो
बहेने जा रहल छै
कतेको आँखि'क मैल के
ओ की बुझैत नहि छै
जे किएक
साँझू पहर 'रोज़' बाँटैकाल
ओकर पंहुचा पकड़' चाहै छै
ओकर
अधबयसू ठीकेदार!
दुखित रहितो
भोरे-भोर
निकलल रहै ओ
ठेला ल' 
जे कने बेसी कैंचा कमा लितै आई,
से की जाने गेलै
जे 
कोन सक्कत सरदार जी सं पाला पड़लै,
ओ लादि देलकै दू लदान'क माल-
एक्कहि बेरि
ताहि पर
ओतेक हुज्जति'क बादो
कहाँ देलकै उचित मजूरी
असोथकित भ' बैसल
सोचि रहल छै - रामकिसुन।
से
ओ छोटुआ हो, 
दुलरिया हो
आकि रामकिसुन
कहाँ बुझैल छै ककरो
जे
आई कियैक तै' कयने छै सरकार - 
कोनो 'मजूर दिबस' 
आकि
बगल'क
बड़का टी. भी'क दोकान'क 
रंग-बिरंग'क, छोटका-बड़का परदा पर
झक्क उज्जर पैजामा-कुरता
पहिरने नेता सभ
अपने में कटांउझ करैत
कियैक उड़ा रहल छै थूक
मार्क्स, लेलिन, स्तालिन, माओ, बर्ज़ुआ
साम्यवाद, समाजवाद, विकासवाद
किदन-कहांदन चिचियाइत।
छोटुआ कें त'
मतलब छै
पाँच टका कम भेंट'बला दिहाड़ी सं
जाहि सं 
ख़रिदतै औखधि ओ
पथरी के दरद सं बेचैन माय लेल।
दुलरिया फेर
आईयो सहतै 
साँप सन सहसहाइत आंगुर 
बज्जरखसुआ ठीकेदार'क -
मजूरी लेल
जाहि सं
अओतै ओकर मुनियां'क किताब-कॉपी-पिलसिन
ताकि
पढ़ि-लिखि बनतै ओ एहने कोनो 
हॉस्पीटल'क 
साफ़, सुन्नर सन सिस्टर।
रामकिसुन भरोदिन
सहतै हुज्जति आ अनेती
कोनो मारवाड़ी, पंजाबी आकि गुजराती सेठ'क
चारि कैंचा लेल
जाहि सं जुरतै
ओकरा घर'क चौका,
कि
धिया-पुता'क लत्ता-कपड़ा
आकि
टका-टका जोड़ि
भ' सकै त' पूर भ' जाई ओकर
दस बाइ दस के एकटा अप्पन झुग्गी'क सपना।
छोटुआ हो कि दुलरिया आकि रामकिसुन,
ओकरा की मतलब
जे कियैक बन्न रहै छै
आजु'क दिन 
बड़का-बड़का ऑफ़िस आ बैंक सभ
भरल रहै छै चमचमाइत मॉल, मल्टीप्लेक्स 
'मजूर दिबस'क ना' पर।

- प्रणव कान्त झा
०१ मई, २०१६.