शनिवार, 20 जुलाई 2013

अनूदित मैथिली रचना - २

एकटा धिया,
बतियाइत रहय 
एक गोट बेख सं-
तोहर आ हम्मर 
बिधना एक्कहि रंग;
हमरा
गर्भक भीतरे
मारल जाइछ, आ
तोहरा
गर्भक बाहिर.

ओ गाछ,
बेटीक पीर कें
आत्मसात करैत बाजल-
हे हय बहिना!
हम दुहु गोटे मिलियो कें,
की बुझा सकब
अहि मनुक्ख जाति कें, कि
अपने पयर पर
कुरहरि मारब
बुझनुकक काज नहिं?

धिया/धरती केर
उर्वरा थिक
आओर
बेख......नूतनता.
की हमरा-तोहरा बिन
अहि जगत केर
सपनो संभव?

हे माँ शारदे!
तोहरो चरण में
शत-शत प्रणाम.

आब तोंही,
हमरा सभ कें
बुद्धि दे, ज्ञान दे;
जाहि सं
प्रकृति केर
अहि दुहू
अनमोल रचना केर-
महातम बुझि सकी;
अहि दुहू सं-
नेह कय सकी.

हिंदी सं अनुवाद: प्रणव कान्त. १५ फरवरी, २०१३
साभार: नेहा कर्ण.

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