बंद है मन,
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा-
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर।
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएं,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें-
या फिर घड़ी की टिक-टिक चारों ओर।
सब कुछ पूर्ववत-
स्थिर, स्तब्ध-
सिवाय एक समय के चलने की आवाज़ के।
यह भंग करती है सन्नाटे को -
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक।
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों की झीरियों से -
झाँक रहीं हैं कुछ किरणें।
यह घड़ी की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा-
कि
बंद दरवाज़ों
और
गहरी नीरवता के पार-
निखरी है दुनियाँ।
इन किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक;
तोड़ ही देंगी
सन्नाटों और अंधेरों से भरी-
इस दुनियाँ के
बंद दरवाज़ों को;
कभी-ना-कभी।
प्रणव कान्त झा
२१ अप्रैल, २०१३।
बंद हैं आँखें,
बंद हैं दरवाज़े,
चारों तरफ़ पसरा है सन्नाटा-
फैला है स्याह अँधेरा चारों ओर।
चुप हैं होंठ,
चुप हैं हवाएं,
चुप हैं फिज़ाएं,
गूंजती हैं बस दिल की धडकनें-
या फिर घड़ी की टिक-टिक चारों ओर।
सब कुछ पूर्ववत-
स्थिर, स्तब्ध-
सिवाय एक समय के चलने की आवाज़ के।
यह भंग करती है सन्नाटे को -
नीरवता के दरवाज़े पर
देती है दस्तक।
क्या यह दस्तक है परिवर्तन का?
अरे देखो,
उन बंद दरवाज़ों की झीरियों से -
झाँक रहीं हैं कुछ किरणें।
यह घड़ी की टिक-टिक,
किरणों का उजास,
देते हैं भरोसा-
कि
बंद दरवाज़ों
और
गहरी नीरवता के पार-
निखरी है दुनियाँ।
इन किरणों की दस्तक
और
घड़ी की टिक-टिक;
तोड़ ही देंगी
सन्नाटों और अंधेरों से भरी-
इस दुनियाँ के
बंद दरवाज़ों को;
कभी-ना-कभी।
प्रणव कान्त झा
२१ अप्रैल, २०१३।
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